श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  11.17.43 
शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो
धर्मं महान्तं विरजं जुषाण: ।
मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठ-
न्नातिप्रसक्त: समुपैति शान्तिम् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
खेतों और मंडियों से बिखरे अनाज को बीन कर ब्राह्मण गृहस्थ को अपने मन में सन्तुष्टि रखनी चाहिए। निजी इच्छाओं से मुक्त रहते हुए अपना मन मुझमें लगा कर उसे उदात्त धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए। इस तरह गृहस्थ के रूप में ब्राह्मण बिना मोह के घर में रह सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
 
A Brahmin householder should be satisfied in his mind by picking up the grains fallen in the fields and markets. He should practice the lofty religious principles by remaining absorbed in Me, keeping himself free from personal desires. In this way, as a householder, a Brahmin can live at home without attachment and attain salvation.
तात्पर्य
महानतम का आशय दानशील धार्मिक सिद्धांतों से है जैसेकि अतिथि का, यहाँ तक कि अनंंत्रित और अप्रत्याशित, अति-सत्कारपूर्वक स्वागत करना। गृहस्थों को चाहिए कि दूसरों के प्रति सदैव उदारचेता और दयावान हों, साथ ही पारिवारिक जीवन में अनावश्यक स्नेह और लगाव पर अंकुश रखने में सावधान रहें। अतीत में, अत्यंत त्यागी ब्राह्मण गृहस्थ बाजारों में गिरे हुए या कटाई पश्चात खेतों में छूटे हुए अनाज को एकत्रित करते थे। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तत्व है मय्य अर्पित आत्मा, अर्थात् भगवान कृष्ण में मन को स्थिर रखना। अपनी भौतिक स्थिति के बावजूद, जो कोई भी भगवान के निरंतर ध्यान में लगा रहता है, वह सद्गति को प्राप्त हो सकता है। जैसा कि भक्तिरसामृतसिंधु (1.2.187) में बताया गया है:

आईह यस्य हरिर्दास्ये

कर्मना मनसा गिरा

निर्खिलास्व अपि अवस्थासु

जीवन मुक्तः स उच्यते

"जो व्यक्ति कृष्ण भावना (अथवा अन्य शब्दों में, कृष्ण की सेवा) में अपने शरीर, मन, बुद्धि और वाणी से कार्य करता है, भौतिक संसार में रहते हुए भी वह एक मुक्त व्यक्ति है, चाहे वह अनेकों तथाकथित भौतिक क्रियाकलापों में लगा क्यों न हो।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)