श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.17.42 
ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते ।
कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण का शरीर क्षुद्र भौतिक विषय-वासनाओं को भोगने के लिए नहीं है; बल्कि कठिन तपस्याओं को स्वीकार करके, एक ब्राह्मण मृत्यु के बाद असीम सुख का आनंद लेगा।
 
The body of a Brahmin is not meant for petty sensual pleasures; rather, after accepting difficult penance, he will enjoy immense happiness after death.
तात्पर्य
प्रश्न उठ सकता है कि ब्राह्मण को स्वेच्छा से अपने शरीर और आत्मा को एक साथ रखने में असुविधा क्यों सहनी पड़ती है। इस श्लोक में भगवान स्पष्ट करते हैं कि उन्नत मानव जीवन गंभीर तपस्या के लिए है न कि तुच्छ इंद्रियतृप्ति के लिए। आध्यात्मिक उन्नति द्वारा व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर पर अलौकिक आनंद में स्थिर हो जाता है और अस्थायी भौतिक शरीर में व्यर्थ अवशोषण को छोड़ देता है। भौतिक शरीर से अलग रहना चाहिए, केवल जीवन की नंगे आवश्यकताओं को स्वीकार करना चाहिए। ब्राह्मण, आजीविका का एक परेशानी भरा रूप स्वीकार करके, कभी नहीं भूलते कि भौतिक शरीर बूढ़ा होने, बीमार पड़ने और दुख में मरने के लिए नियत है। इस प्रकार सचेत और पारलौकिक रहते हुए, एक उन्नत ब्राह्मण, इस जीवन के अंत में, वापस घर, वापस भगवान् के पास जाता है, जहाँ वह असीमित आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करता है। ऐसी उच्च जागरूकता के बिना, व्यक्ति को योग्य ब्राह्मण कैसे माना जा सकता है? वे भक्त जो चौबीसों घंटे भगवान कृष्ण के मिशन को फैलाने में लगे रहते हैं, वे त्याग या इंद्रिय सुख के मंच से परे हैं क्योंकि वे सब कुछ भगवान कृष्ण की सेवा में लगाते हैं। भगवान का एक शुद्ध भक्त केवल भगवान की सेवा करने के लिए शक्ति प्राप्त करने के लिए खाता है और शरीर के लिए केवल भव्य या कम भोजन स्वीकार नहीं करता है। हालाँकि, भगवान के लिए सब कुछ स्वीकार किया जा सकता है, यहाँ तक ​​कि भव्य भोजन भी। एक ब्राह्मण जो रात-दिन भगवान की महिमा फैलाने के लिए काम नहीं कर रहा है, उसे अपने व्यक्तिगत इंद्रिय सुख के लिए भव्य रूप से खाने में शर्म आनी चाहिए, लेकिन एक त्यागी वैष्णव प्रचारक सभी वर्ग के पवित्र लोगों से निमंत्रण स्वीकार कर सकता है, और सिर्फ उनके घरों को आशीर्वाद देने के लिए वह उन्हें भेंट किए गए भव्य भोजन को खाएगा। इसी तरह, वह कभी-कभी नास्तिकों और अवैयक्तिकवादियों को हराने के लिए शक्ति पाने के लिए भव्य भोजन करता है। जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है, व्यक्ति तब तक उच्च योग्य ब्राह्मण नहीं बन सकता जब तक कि वह भगवान का भक्त न बन जाए। और भक्तों के बीच, जो कृष्ण चेतना का प्रचार कर रहे हैं, वे सर्वश्रेष्ठ हैं, जैसा कि स्वयं भगवान ने भगवद-गीता के अठारहवें अध्याय में पुष्टि की है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)