इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम् ।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणस्यैव याजनम् ॥ ४० ॥
अनुवाद
सभी द्विजातिजों अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को यज्ञ करना चाहिए, वैदिक ज्ञान का अध्ययन करना चाहिए और दान देना चाहिए। लेकिन, केवल ब्राह्मण ही दान ले सकते हैं, वैदिक ज्ञान की शिक्षा दे सकते हैं और दूसरों की ओर से यज्ञ कर सकते हैं।
All the Dwijas, i.e. Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas, should perform Yajnas, study Vedic literature and give donations. But only Brahmins can accept donations, impart Vedic knowledge and perform Yajnas for others.
तात्पर्य
सभी सभ्य मनुष्यों को त्यागपूर्ण अनुष्ठानों में भाग लेना चाहिए, दान देना चाहिए और वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। द्विजों में श्रेष्ठ, अर्थात् ब्राह्मण, विशेष रूप से समाज के सभी सदस्यों की ओर से त्यागपूर्ण अनुष्ठानों का नेतृत्व करने, सभी को वैदिक ज्ञान सिखाने और सभी का दान प्राप्त करने के लिए सशक्त होते हैं। योग्य ब्राह्मणों की सहायता या भागीदारी के बिना, निम्न वर्ग वैदिक साहित्य का ठीक से अध्ययन नहीं कर सकते, यज्ञ नहीं कर सकते या दान नहीं दे सकते, क्योंकि उनके पास ऐसे कार्यों को पूर्ण रूप से निष्पादित करने के लिए आवश्यक बुद्धि नहीं होती है। जब क्षत्रिय और वैश्य सच्चे ब्राह्मणों का आश्रय लेते हैं, तो वे अपने संबंधित कर्तव्यों का पालन ठीक से करने में सक्षम होते हैं, और समाज सुचारू रूप से और कुशलता से कार्य करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥