श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  11.17.39 
गृहार्थी सद‍ृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम् ।
यवीयसीं तु वयसा यां सवर्णामनुक्रमात् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन स्थापित करना चाहता है, उसे अपनी ही जाति की कोई ऐसी स्त्री से विवाह करना चाहिए जो निष्कलंक हो और उम्र में छोटी हो। यदि कोई व्यक्ति एक से अधिक पत्नियाँ रखना चाहता है, तो उसे अपनी पहली पत्नी के बाद दूसरी पत्नी से विवाह करना चाहिए, और हर पत्नी की जाति क्रमिक रूप से निम्न होनी चाहिए।
 
A person who wants to start a married life should marry a woman of his own caste who is blameless and younger in age. If a person wants to have many wives, he should marry them after the first marriage and every wife should be of a lower caste than the other.
तात्पर्य

जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है,

त्रिस्रो वार्णानुपूर्व्येण

द्वे तथाकैका यथाक्रमं

ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशां

भार्याः स्वाः शूद्र-जन्मनः

इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि किसी की पहली पत्नी सदृशिम होनी चाहिए, या स्वयं के समान। दूसरे शब्दों में, एक विद्वान व्यक्ति को एक विद्वान पत्नी से विवाह करना चाहिए, एक वीर व्यक्ति को एक वीर पत्नी से विवाह करना चाहिए, एक व्यापार-दिमाग वाले व्यक्ति को एक ऐसी महिला से विवाह करना चाहिए जो उसे ऐसी गतिविधियों में प्रोत्साहित कर सके, और एक शूद्र को एक कम बुद्धिमान महिला से विवाह करना चाहिए। पत्नी को अपनी पृष्ठभूमि और चरित्र के मामले में निंदा से परे होना चाहिए और हमेशा खुद से छोटी होनी चाहिए, आदर्श रूप से पांच से दस साल छोटी। यदि कोई दूसरी पत्नी से विवाह करना चाहता है, तो, जैसा कि इस श्लोक में वार्णानुपूर्व्येण शब्द और भगवान कृष्ण द्वारा बोले गए श्लोक में अनुक्रमत शब्द द्वारा कहा गया है, किसी को पहली शादी के स्थापित होने तक इंतजार करना चाहिए और फिर अगली-निम्न जाति से दूसरी पत्नी का चयन करना चाहिए। यदि कोई तीसरी बार विवाह करता है तो पत्नी पुनः अगली-निम्न जाति से होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, एक ब्राह्मण की पहली पत्नी ब्राह्मणी होगी, उसकी दूसरी पत्नी क्षत्रिय समुदाय से होगी, उसकी तीसरी पत्नी वैश्य समुदाय से और चौथी पत्नी शूद्र समुदाय से होगी। क्षत्रिय पहले क्षत्रिय महिला और फिर वैश्य और शूद्र महिलाओं से विवाह कर सकता है। वैश्य दो वर्गों से पत्नियों को स्वीकार कर सकता है, और एक शूद्र केवल शूद्र वर्ग से ही पत्नी स्वीकार करेगा। विवाह की इस प्रगति से परिवार में सापेक्षिक शांति रहेगी। ये वैदिक विवाह निषेध, जैसा कि पिछले श्लोक में उल्लिखित है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए हैं जो भगवान के शुद्ध भक्त नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)