श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  11.17.38 
गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तम: ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेन्नान्यथामत्परश्चरेत् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करना चाहने वाले ब्रह्मचारी को अपने परिवार के साथ घर पर रहना चाहिए और जो गृहस्थ अपनी चेतना को शुद्ध करना चाहता है उसे जंगल में रहना चाहिए जबकि शुद्ध ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। जो मेरे शरण में नहीं है उसे क्रमशः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाना चाहिए और इसके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए।
 
अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करना चाहने वाले ब्रह्मचारी को अपने परिवार के साथ घर पर रहना चाहिए और जो गृहस्थ अपनी चेतना को शुद्ध करना चाहता है उसे जंगल में रहना चाहिए जबकि शुद्ध ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। जो मेरे शरण में नहीं है उसे क्रमशः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाना चाहिए और इसके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए।
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