अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करना चाहने वाले ब्रह्मचारी को अपने परिवार के साथ घर पर रहना चाहिए और जो गृहस्थ अपनी चेतना को शुद्ध करना चाहता है उसे जंगल में रहना चाहिए जबकि शुद्ध ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। जो मेरे शरण में नहीं है उसे क्रमशः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाना चाहिए और इसके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए।
A brahmacari desirous of satisfying his material desires should stay at home with his family, a householder desirous of purifying his consciousness should enter the forest, while a pure brahmin should take to sannyasa. One who is not surrendered to Me should go from one hermitage to another gradually and should not act contrary to this.
तात्पर्य
जो भगवान के पूर्णतः समर्पित भक्त नहीं हैं, उन्हें सामाजिक जीवन से जुड़े अपने कर्तव्यों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। जीवन में चार सामाजिक विभाग होते हैं, जैसे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। मनुष्य को यदि भौतिक अभिलाषाओं को पूरा करना है तो उसे एक सामान्य गृहस्थ बनना चाहिए, एक सुखद निवास स्थान बनाना चाहिए और अपने परिवार का भरण पोषण करना चाहिए। शुद्धि की प्रक्रिया को तेज करना चाहने वाला व्यक्ति अपने घर और व्यवसाय को छोड़कर पवित्र स्थान पर अपनी पत्नी के साथ रह सकता है, जिसे यहाँ वनम या "वन" शब्द से इंगित किया गया है। भारत में इस उद्देश्य के लिए कई पवित्र वन हैं, जैसे वृंदावन और मायापुर। द्विजोत्तम शब्द ब्राह्मणों को इंगित करता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी द्विज हैं, या गायत्री मंत्र में दीक्षित हैं, लेकिन ब्राह्मण द्विजोत्तम है, या उन लोगों में सर्वश्रेष्ठ है जिन्हें आध्यात्मिक दीक्षा द्वारा दूसरा जन्म प्राप्त हुआ है। यह अनुशंसा की जाती है कि एक शुद्ध ब्राह्मण अपनी तथाकथित पत्नी के साथ और अधिक संपर्क को त्यागकर जीवन के त्यागमय आदेश (संन्यास) को अपना लें। ब्राह्मण का यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, क्योंकि क्षत्रिय और वैश्यों को जीवन के त्यागमय आदेश को नहीं लेना है। फिर भी, भागवत में कई कहानियाँ हैं जहाँ महान राजा अपनी कुलीन पत्नियों के साथ वन में वानप्रस्थ की तपस्या का अभ्यास करने जाते हैं और इस प्रकार शुद्धि की प्रक्रिया को तेज करते हैं। हालाँकि, ब्राह्मण सीधे जीवन के त्यागमय आदेश को स्वीकार कर सकते हैं। आश्रमाद आश्रमं गच्छेत शब्द इंगित करते हैं कि कोई व्यक्ति ब्रह्मचारी जीवन से गृहस्थ जीवन में, फिर वानप्रस्थ जीवन में और फिर संन्यास में उत्तरोत्तर आगे बढ़ सकता है। आश्रमाद आश्रमम् शब्द इस बात पर ज़ोर देता है कि व्यक्ति को कभी भी अधिकृत सामाजिक स्थिति के बिना नहीं रहना चाहिए, और न ही उसे पीछे जाना चाहिए, और ऊँची स्थिति से नीचे गिरना चाहिए। जो लोग भगवान के समर्पित भक्त नहीं हैं, उन्हें ऐसे आदेशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए, अन्यथा वे जल्दी ही पतित हो जाएँगे, और उनके पाप उन्हें मानवीय सभ्यता की सीमा से बाहर कर देंगे। भगवान कृष्ण यहाँ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि एक अभक्त को वैदिक सामाजिक विभाजनों के अनुष्ठानों और नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए, जबकि भगवान का शुद्ध भक्त, चौबीस घंटे भगवान कृष्ण के मिशन में लगा रहता है, ऐसे विभाजनों के परे है। हालाँकि, यदि कोई वैदिक सामाजिक विभाजनों से पार होने के बल पर अवैध गतिविधियाँ करता है, तो उसे एक भौतिकवादी नौसिखिया और भगवान का उन्नत भक्त नहीं माना जाता है। एक उन्नत भक्त, जो भौतिक इंद्रिय तृप्ति से अलग रहता है, वैदिक सामाजिक विभाजनों से बंधा नहीं है; इस प्रकार एक गृहस्थ भी बहुत सादगी से रह सकता है, घर से दूर कृष्ण चेतना की यात्रा कर सकता है और प्रचार कर सकता है, और यहाँ तक कि एक संन्यासी भी कभी-कभी भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा में महिलाओं को शामिल कर सकता है। सबसे उन्नत भक्त वर्णाश्रम प्रणाली के अनुष्ठानों और नियमों से प्रतिबंधित नहीं हो सकते हैं, और वे ईश्वर के प्रेम को वितरित करते हुए पूरी दुनिया में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। मत-पर्यंत एक ऐसे भगवान के शुद्ध भक्त को इंगित करता है जो हमेशा अपने हृदय और चेतना में भगवान को स्थापित रखता है। जो व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति का शिकार बन जाता है, वह मत-पर्यंत के मंच पर पूरी तरह से स्थापित नहीं होता है और पवित्र मानव जीवन के मंच पर स्थिर रहने के लिए सामाजिक विभाजनों और नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥