श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  11.17.36 
एवं बृहद्‍व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् ।
मद्भ‍क्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोऽमल: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचर्य का बड़ा व्रत लेकर ब्राह्मण अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है और गहन तपस्या से भौतिक कर्म करने की इच्छा को जला कर खाक कर देता है। इस तरह भौतिक इच्छा के मैल से रहित होकर, वह मेरा भक्त बन जाता है।
 
A brahmin who takes the great vow of celibacy becomes as radiant as fire and by intense austerity he destroys the desire to perform material actions. Thus, freed from the contamination of material desire, he becomes My devotee.
तात्पर्य
मुक्ति की प्रक्रिया इस श्लोक में वर्णित है। एक बार जब श्रील प्रभुपाद हवाई जहाज से यात्रा कर रहे थे, तो एक साथी यात्री, जो एक पादरी था, ने उसे बताया कि उसने उसके शिष्यों को देखा था और उन्हें "उज्ज्वल-चेहरा" पाया। श्रील प्रभुपाद इस घटना को सुनाना बहुत पसंद करते थे। आत्मा सूर्य से भी अधिक तेजस्वी है, और जैसे-जैसे आध्यात्मिक शुद्धि की प्रक्रिया धीरे-धीरे प्रभाव डालती है, वैसे-वैसे भक्त का बाहरी रूप भी तेजस्वी हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान की चमकती हुई अग्नि इंद्रिय तृप्ति की मानसिकता को भस्म कर देती है, और व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कठोर हो जाता है और सांसारिक भोगों में अनासक्त हो जाता है। सभी तपस्याओं में श्रेष्ठ है ब्रह्मचर्य, जिससे भौतिक जीवन की बेड़ियाँ तुरंत ढीली हो जाती हैं। जो अमल है, भौतिक इच्छा से मुक्त है, उसे भगवान का शुद्ध भक्त कहा जाता है। ज्ञान, कर्म और योग के मार्गों पर मन व्यक्तिगत स्वार्थ की अवधारणा बनाए रखता है, लेकिन शुद्ध भक्ति के मार्ग पर मन को केवल भगवान के हितों को देखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इस प्रकार भगवान का शुद्ध भक्त अमल है, सर्वथा शुद्ध है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)