श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.17.32 
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम् ।
अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मष: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार गुरु की सेवा द्वारा वैदिक ज्ञान से प्रबुद्ध होकर, समस्त पापों और द्वैत से मुक्त होकर, व्यक्ति को अग्नि, गुरु, स्वयं तथा समस्त प्राणियों में प्रकट होने वाले परमात्मा के रूप में मेरी पूजा करनी चाहिए।
 
Thus, a person enlightened in Vedic knowledge, freed from all sins and dualities by serving the Guru, should worship Me as the Supreme Being, because I manifest in the fire, the Guru, the human soul and in all living beings.
तात्पर्य
वेदनिष्ठ आचार-विचार में निपुण सच्चे गुरु की निष्ठापूर्वक सेवा करने से व्यक्ति गौरवशाली और निर्मल हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध होकर वह कभी विरोधी गतिविधियाँ नहीं करता जो आध्यात्मिक ज्ञान की अग्नि को तुरंत बुझा देती है; न ही वह मूर्ख बनता है और भौतिक प्रकृति का व्यक्तिगत भावों से संतुष्टि के लिए शोषण करने का प्रयास करते हुए लघु होता है। एक पवित्र मानव अपृथग-धी या द्वैत की चेतना के बिना होता है, क्योंकि उसे सभी चीजों के भीतर भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को देखने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इस तरह की उदात्त चेतना को व्यवस्थित रूप से पूरी दुनिया में सिखाया जाना चाहिए ताकि मानव समाज शांतिपूर्ण और उदात्त बने।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)