श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.17.30 
एवंवृत्तो गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जित: ।
विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जब तक विद्यार्थी अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण न कर ले, उसे गुरु के आश्रम में कार्यरत रहना चाहिए, उसे इन्द्रियतृप्ति से पूर्णतया मुक्त रहना चाहिए और उसे अपना ब्रह्मचर्य व्रत नहीं तोडऩा चाहिए।
 
Until the student completes his Vedic education, he must work in the Guru's ashram, he must remain completely free from sense gratification and he must not break his vow of celibacy.
तात्पर्य
इस श्लोक में उपकुरुवाण-ब्रह्‍मचारी का वर्णन है, जो वैदिक शिक्षा पूरी करने के बाद गृहस्थ-आश्रम या पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है। एवम्-वृत्तः शब्द यह दर्शाता है कि हालांकि कोई व्यक्ति अंततः विवाह कर सकता है और एक बुद्धिजीवी, राजनेता या व्यवसायी के रूप में समाज में प्रमुख बन सकता है, छात्र जीवन के दौरान उसे एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के विनम्र सेवक के रूप में झूठी प्रतिष्ठा के बिना रहना चाहिए। नैष्ठिकी-ब्रह्मचारी, जो कभी विवाह नहीं करता है, का वर्णन अगले श्लोक में किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)