"यह एक गद्य श्लोक श्रीमद् भागवतम (11.17.27) से लिया गया है। यह उस समय भगवान् श्री कृष्ण द्वारा कहा गया था जब उद्धव ने उनसे समाज की चार सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्थाओं के बारे में पूछा था। वह विशेष रूप से निर्देश दे रहे थे कि एक ब्रह्माचारी को अपने गुरू की देखरेख में कैसा व्यवहार करना चाहिए। एक गुरू, अपने शिष्यों द्वारा दी गई सुविधाओं का उपभोक्ता नहीं होता है। वह माता-पिता की तरह होता है। अपने माता-पिता की सावधानी पूर्वक सेवा के बिना एक बच्चा वयस्क नहीं हो सकता है, इसी तरह बिना गुरू की देखरेख के कोई व्यक्ति आध्यात्मिक सेवा के स्तर पर नहीं पहुंच सकता।
"गुरु को आचार्य भी कहा जाता है, जो आध्यात्मिक विज्ञान का एक दिव्य प्रोफ़ेसर होता है। मनु संहिता (2.140) में एक आचार्य के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों को अपने संरक्षण में लेता है, उन्हें सभी जटिलताओं के साथ वैदिक ज्ञान सिखाता है और उन्हें दूसरा जन्म देता है। एक शिष्य को आध्यात्मिक विज्ञान के अध्ययन की दीक्षा देने की प्रक्रिया को उपनीत कहा जाता है। यह वह कार्य है जो किसी व्यक्ति को उसके गुरु के और अधिक निकट लाता है। जो व्यक्ति एक गुरु के और अधिक निकट नहीं लाया जा सकता है, वह पवित्र धागा धारण नहीं कर सकता और इस तरह उसे शूद्र कहा जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के शरीर पर धारण किया गया पवित्र धागा गुरु द्वारा दी गई दीक्षा का प्रतीक होता है। यह तब मूल्यवान नहीं रहता जब उसे मात्र अपने ऊंचे वंश पर गर्व करने के लिए पहना जाता है। एक गुरु का कर्तव्य होता है कि वह शिष्य का पवित्र धागा संस्कार द्वारा दीक्षा दे और फिर इस संस्कार, या शुद्धिकरण की प्रक्रिया के बाद, उसके गुरु वास्तव में शिष्य को वेदों के बारे में शिक्षा देना शुरू करते हैं। एक शूद्र के रूप में पैदा हुआ व्यक्ति भी ऐसी आध्यात्मिक दीक्षा से वंचित नहीं किया जाता है, बशर्ते कि वह गुरु द्वारा स्वीकृत हो, जो एक शिष्य को ब्राह्मण बनने के अधिकार को प्रदान करने के लिए विधिवत् अधिकृत होता है यदि वह उसे पूर्ण रूप से योग्य पाता है। वायु पुराण में एक आचार्य को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो सभी वैदिक साहित्यों के अर्थ को जानता है, वेदों के उद्देश्य को स्पष्ट करता है, उनके नियमों और विनियमों का पालन करता है और अपने शिष्यों को भी उसी तरह कार्य करने के लिए शिक्षा देता है।
"केवल अपनी उदात्त करुणा से ही ईश्वर का व्यक्तित्व स्वयं को एक गुरु के रूप में प्रकट करता है। इसलिए एक आचार्य के व्यवहार में कुछ भी नहीं होता सिर्फ प्रभु के लिए दिव्य प्रेममय सेवा के कार्य होते हैं। वह भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है। इस तरह के एक दृढ़ भक्त का आश्रय लेना उचित है, जिसे आश्रय-विग्रह कहा जाता है, या भगवान का वह रूप जिसका आश्रय लेना चाहिए।
"यदि कोई व्यक्ति अपने आप को एक आचार्य के रूप में प्रस्तुत करता है लेकिन प्रभु के प्रति सेवा भाव नहीं रखता, तो उसे अपराधी माना जाना चाहिए और यह अपमानजनक दृष्टिकोण उसे एक आचार्य बनने के लिए अयोग्य बना देता है। वास्तविक आध्यात्मिक गुरु हमेशा परमेश्वर के प्रति अविरल भक्ति सेवा में संलग्न होता है। इस परीक्षा से ही उसे प्रभु का प्रत्यक्ष स्वरूप और श्री नित्यानंद प्रभु का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता है। ऐसे गुरु को आचार्यदेव के रूप में जाना जाता है। ईर्ष्यालु स्वभाव से प्रभावित और कामुक संतुष्टि के दृष्टिकोण के कारण असंतुष्ट व्यक्ति एक वास्तविक आचार्य की आलोचना करते हैं। लेकिन वास्तव में, एक वास्तविक आचार्य ईश्वर के व्यक्तित्व से अलग नहीं होता है, इसलिए ऐसे आचार्य से ईर्ष्या करना ईश्वर के व्यक्तित्व से ही ईर्ष्या करना है। यह आध्यात्मिक प्राप्ति को रोकने वाला एक प्रभाव उत्पन्न करेगा।
जैसा कि पहले बताया गया, शिष्य को हमेशा आध्यात्मिक गुरु का सम्मान भगवान श्रीकृष्ण के प्रकटीकरण के रूप में करना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी हमेशा याद रखना चाहिए कि एक आध्यात्मिक गुरु को कभी भी भगवान के दिव्य लीलाओं की नकल करने के लिए अधिकृत नहीं किया जाता है। झूठे आध्यात्मिक गुरु खुद को हर तरह से भगवान श्रीकृष्ण के समान बताते हैं, अपने शिष्यों की भावनाओं को शोषण करने के लिए, लेकिन ऐसे निराकारवादी केवल अपने शिष्यों को गुमराह कर सकते हैं, क्योंकि उनका अंतिम उद्देश्य भगवान के साथ एक होना है। यह भक्ति पंथ के सिद्धांतों के खिलाफ है।
"वास्तविक वैदिक दर्शन अचिन्त्य-भेद-अभेद-तत्व है, जो हर चीज को एक साथ भगवान के व्यक्तित्व के साथ एक और अलग स्थापित करता है। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की वास्तविक स्थिति है और कहते हैं कि व्यक्ति को हमेशा आध्यात्मिक गुरु के बारे में मुकुंद (श्री कृष्ण) के साथ उसके घनिष्ठ संबंध के संदर्भ में सोचना चाहिए। श्रील जीव गोस्वामी ने अपने भक्ति-संदर्भ (213) में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है कि एक शुद्ध भक्त का आध्यात्मिक गुरु और भगवान शिव को भगवान के व्यक्तित्व के साथ एक के रूप में देखना उनकी प्रभु को बहुत प्रिय होने के संदर्भ में मौजूद है, न कि हर लिहाज से उनके समान। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी और श्रील जीव गोस्वामी के पद-चिन्हों पर चलते हुए, बाद में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जैसे आचार्यों ने उन्हीं सत्यों की पुष्टि की है। आध्यात्मिक गुरु से अपनी प्रार्थनाओं में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर पुष्टि करते हैं कि सभी प्रकट शास्त्र आध्यात्मिक गुरु को भगवान के व्यक्तित्व के साथ समान स्वीकार करते हैं क्योंकि वह भगवान का एक बहुत ही प्रिय और विश्वासपात्र सेवक है। इसलिए गौड़ीय वैष्णव श्रील गुरुदेव (आध्यात्मिक गुरु) की पूजा उनके भगवान के व्यक्तित्व के सेवक होने के नाते करते हैं। भक्ति सेवा के सभी प्राचीन साहित्य और श्रील नारसिंह दास ठाकुर, श्रील भक्ति-विनोद ठाकुर और अन्य निर्मल वैष्णवों के हालिया गीतों में, आध्यात्मिक गुरु को हमेशा श्रीमति राधारानी के किसी एक विश्वासपात्र सहयोगी या श्रील की प्रकट प्रतिनिधि माना जाता है। नित्यानंद प्रभु।"
