श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.17.23 
मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् ।
जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठ: कुशान् दधत् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचारी को नियमित रूप से मूँज की पेटी और मृगचर्म के वस्त्र पहनने चाहिए। उसे जटा (लंबे और उलझे हुए बाल) रखने चाहिए और दंड (एक लंबी छड़ी) तथा कमंडल (एक बर्तन जिसमें पानी होता है) धारण करना चाहिए। उसे अपने गले में अक्ष के मनके और जनेऊ पहनना चाहिए। अपने हाथ में शुद्ध कुश घास लेकर उसे कभी भी आरामदायक या उतेजक आसन ग्रहण नहीं करना चाहिए। उसे बेकार में अपने दाँत साफ नहीं करने चाहिए और न ही अपने कपड़ों का रंग उड़ाना चाहिए या उन पर इस्त्री करना चाहिए।
 
A brahmacārī should regularly wear a girdle of jute and deerskin. He should keep matted hair and carry a staff and a water pot. He should wear aksha beads and a sacred thread. Holding pure kuṣa in his hand, he should never assume any luxurious or provocative posture. He should not unnecessarily polish his teeth, nor bleed or iron his clothes.
तात्पर्य
अधौत-दद्-वासा अर्थात कि बिना चमकिला मुस्कान बनाने के लिए कि मैं सामने वाले व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित कर सकूं साँसारिक विरक्त ब्रह्मचारी नहीं होते, न ही उसे अपने बाहारी वस्त्र पर कोई खास ध्यान रहता है। ब्रह्मचारी जीवन तपस्या और अपने गुरु का अनुपालन करने के लिए है जिससे बाद के जीवन में भले ही वह एक व्यापारी, राजनीतिज्ञ या बौद्धिक ब्राह्मण बन जाता हो, तो भी वह अपने पात्र के संसाधनों, अनुशासन, आत्मसंयम, तपस्या और नम्रता का लाभ उठा सके। विद्यार्थी जीवन, जैसा कि यहाँ वर्णन किया गया है, आधुनिक शिक्षा के रूप में जाने वाले बुद्धिहीन सुखवादी जीवन से बहुत अलग है। बेशक, आधुनिक युग में, कृष्ण भक्त ब्रह्मचारी कृत्रिम रूप से यहाँ वर्णित प्राचीन परिधान और कर्मकांड को नहीं अपना सकते; लेकिन आत्मसंयम, पवित्रता और एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु का अनुपालन जैसे मूल्य आज भी वैदिक काल की तरह ही आवश्यक हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)