समाज के द्विजन्मा सदस्य को गायत्री दीक्षा प्राप्त होने पर दूसरे जन्म के संस्कार मिलते हैं। गुरु द्वारा बुलाये जाने पर उसे गुरु के आश्रम में रहना चाहिए। वहाँ उसे आत्मनियंत्रित मन के साथ सावधानी से वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।
A twice-born member of society attains a second birth by undergoing Gayatri initiation through rites. When called by the Guru, he should stay in the Guru's ashram and study the Vedic literature carefully with a self-controlled mind.
तात्पर्य
द्विज पद अर्थात "दो बार जन्मा" यहाँ तीन श्रेष्ठ वर्गों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग को दर्शाता है जो सभी गायत्री मन्त्र प्राप्त करते हैं, जो कि आध्यात्मिक दीक्षा के द्वारा उनके दूसरे जन्म का प्रतीक है। पहला जन्म जैविक या वीर्य से होता है, और यह जरूरी नहीं है कि यह संकेत देता हो कि व्यक्ति बुद्धिमान या प्रबुद्ध है। एक युवा ब्राह्मण बालक, यदि योग्य हो, तो बारह साल की उम्र में गायत्री मंत्र से दीक्षा प्राप्त कर सकता है, और क्षत्रिय और वैश्य कुछ साल बाद। आध्यात्मिक ज्ञान से प्रबुद्ध होने के लिए, बालक गुरुकुल, या आध्यात्मिक गुरु के आश्रम में रहता है। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस ने दुनिया भर में ऐसे ही गुरुकुल स्थापित किए हैं और सभ्य मानवों को अपने बच्चों की उचित शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए महान आह्वान कर रहा है। प्रत्येक युवा लड़के और लड़की को आत्म-नियंत्रित होना सीखना चाहिए और अधिकृत वैदिक साहित्य के अध्ययन के द्वारा प्रबुद्ध बनना चाहिए। इस तरह, सामान्य पशुओं, कीटों, मछली और पक्षियों आदि के विपरीत, एक प्रबुद्ध मनुष्य दो बार जन्म ले सकता है और इस प्रकार उस ज्ञान में पूर्ण हो सकता है जो अंततः मुक्ति की ओर ले जाता है। इस श्लोक में अनुपूर्व्य शब्द संस्कार प्रणाली या शुद्धिकरण संस्कारों को इंगित करता है, जो गर्भाधान-संस्कार से शुरू होते हैं, या यौन क्रिया का शुद्धिकरण। आम तौर पर, शूद्र और जो वैदिक प्रणाली का पालन नहीं करते हैं वे ऐसे शुद्धिकरण समारोहों से आकर्षित नहीं होते हैं; इसलिए वे आध्यात्मिक जीवन से अनजान और वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से ईर्ष्यालु बने रहते हैं। जिनका चरित्र एक व्यवस्थित सफाई प्रक्रिया द्वारा सभ्य हो गया है, वे तर्क-वितर्क और सनकी होने की प्रवृत्ति छोड़ देते हैं और इसके बजाय एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की उपस्थिति में नम्र और सीखने के लिए उत्सुक हो जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥