अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता ।
भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिक: ॥ २१ ॥
अनुवाद
अहिंसा, सच्चाई, ईमानदारी, अन्य लोगों की खुशी और भलाई की इच्छा और काम, क्रोध और लालच से मुक्ति - ये सभी समाज के हर सदस्य के लिए ज़रूरी हैं।
Non-violence, truth, honesty, desire for happiness and well-being of others and freedom from lust, anger and greed—these are the duties of all members of society.
तात्पर्य
शब्द सर्व-वर्णिक यह इशारा करता है कि ऊपर वर्णित सिद्धांत सामान्य धर्मार्थ का गठन करते हैं, जिसे समाज के सभी सदस्यों द्वारा पालन करना चाहिए, यहाँ तक कि वर्णाश्रम प्रणाली से बाहर के लोग भी। हम व्यावहारिक रूप से पाते हैं कि उन समाजों में भी जो वर्णाश्रम प्रणाली से दूर गिर गए हैं, ऊपर उल्लिखित सिद्धांतों का सम्मान और प्रोत्साहन किया जाता है। ऐसे सिद्धांत मुक्ति का एक विशिष्ट मार्ग नहीं बनाते हैं बल्कि मानव समाज में स्थायी गुण हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥