अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रह: ।
काम: क्रोधश्च तर्षश्च स भावोऽन्त्यावसायिनाम् ॥ २० ॥
अनुवाद
मलिनता, बेईमानी, चोरी करना, नास्तिकता, व्यर्थ का झगड़ा, वासना, क्रोध और तृष्णा—ये उनके स्वभाव हैं, जो वर्णाश्रम प्रणाली के बाहर सबसे नीचे के पद पर हैं।
Uncleanliness, dishonesty, stealing, atheism, unnecessary quarreling, lust, anger and greed - these are the nature of those who are in the lowest position outside the varnashram system.
तात्पर्य
यहां भगवान उन लोगों का वर्णन करते हैं जो वर्णाश्रम नामक वैज्ञानिक सामाजिक व्यवस्था के बाहर रहते हैं। यूरोप और अमेरिका में, हमने व्यवहारिक रूप से देखा है कि तथाकथित शिक्षित व्यक्तियों में भी स्वच्छता के मानक घृणित हैं। बिना नहाए और अश्लील भाषा का प्रयोग करना आम बात है। आधुनिक युग में लोग मनमौजी ढंग से जो चाहें बोलते हैं, सभी अधिकारियों को त्याग देते हैं, और इसलिए बहुत कम सच्चाई या सच्चा ज्ञान है। इसी तरह, पूंजीवादी और साम्यवादी दोनों देशों में, हर कोई व्यवसाय, कराधान या एकमुश्त अपराध के नाम पर हर किसी से चोरी करने और लूटने में व्यस्त है। लोगों को न तो ईश्वर के राज्य पर भरोसा है और न ही अपने शाश्वत स्वरूप पर, और इस प्रकार उनका विश्वास बहुत कमजोर है। इसके अलावा, चूंकि आधुनिक मनुष्य कृष्ण चेतना में बहुत रुचि नहीं रखते हैं, इसलिए वे लगातार झगड़ा करते हैं, झगड़ते हैं और भौतिक शरीर से संबंधित पूरी तरह से महत्वहीन मुद्दों पर लड़ते हैं। इस प्रकार थोड़े से भी उकसावे पर भारी युद्ध और हत्याएं होती हैं। कलियुग में वासना, क्रोध और लालसा व्यावहारिक रूप से असीमित हो गई है। यहां बताए गए लक्षण और विशेषताएं दुनिया भर में बहुतायत से देखे जा सकते हैं, जहां भी लोग वर्णाश्रम व्यवस्था से दूर हो गए हैं। पशु हत्या, अवैध यौन संबंध, नशा और जुआ जैसे पापपूर्ण आदतों के कारण, मानव प्राणियों का विशाल बहुमत चांडाल, या अछूत हो गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥