आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम् ।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमा: ॥ १८ ॥
अनुवाद
वैदिक सभ्यता में विश्वास, दान-धर्म करने का भाव, दिखावा न करना, ब्राह्मणों की सेवा करना और धन इकट्ठा करने की निरंतर इच्छा, ये वैश्यों के स्वाभाविक गुण माने गए हैं।
Belief in Vedic civilization, charity, aversion to ostentation, service to Brahmins and a constant desire to accumulate more and more wealth are the natural qualities of the Vaishyas.
तात्पर्य
अतुष्टिर अर्थोपचयैः यह बताता है कि वैश्य कभी भी किसी धनराशि से संतुष्ट नहीं होता और हमेशा अधिक से अधिक जमा करना चाहता है। दूसरी ओर, वह दाननिष्ठ है, या धर्मार्थ कार्य के लिए समर्पित है; ब्रह्मसेवी, हमेशा ब्राह्मणों की सहायता करने में लगा रहता है; और अदम्भ, पाखंड से मुक्त है। यह आस्तिक्यम या वैदिक जीवन शैली में पूर्ण विश्वास के कारण है, और आत्मविश्वास से कि वर्तमान गतिविधियों के लिए अगले जन्म में प्रतिफल या दंड मिलेगा। वैश्यों में धन संचय करने की प्रबल इच्छा सामान्य भौतिक लोभ के समान नहीं है, क्योंकि यह इस श्लोक में उल्लिखित श्रेष्ठ गुणों से पवित्र और संयमित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥