श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  11.17.14 
गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम ।
वक्ष:स्थलाद्वनेवास: संन्यास: शिरसि स्थित: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे विश्वरूप के जघन प्रदेश से विवाह किया हुआ जीवन का क्रम प्रकट हुआ और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले विद्यार्थी मेरे हृदय से निकले। जंगलों में निवास करने वाला संन्यासी जीवन मेरे वक्षस्थल से उत्पन्न हुआ और त्याग और वैराग्य से पूर्ण जीवन मेरे विश्व रूप के सिर के भीतर स्थित था।
 
Married life emerged from the pubic region of my universal form and celibate students emerged from my heart. The life of renunciation residing in the forest emerged from my chest and renunciation was situated within the head of my universal form.
तात्पर्य
ब्रह्मचारी जीवन के दो प्रकार होते हैं। नैष्ठिकी-ब्रह्मचारी जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करता है, जबकि उपकुर्वाण-ब्रह्मचारी अपने छात्र जीवन समाप्त करने के बाद विवाह करता है। जो निरंतर ब्रह्मचारी रहता है, वह भगवान कृष्ण के हृदय में स्थित होता है, लेकिन वे ब्रह्मचारी जो अंततः विवाह करते हैं, वे भगवान के सार्वभौमिक रूप के वंश में स्थित होते हैं। वनवास शब्द का अर्थ है वानप्रस्थ, या सेवानिवृत्त जीवन की स्थिति, जो भगवान के सीने पर स्थित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)