श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.17.12 
त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्‍त्रयी ।
विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मख: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
हे परम सौभाग्यशाली, त्रेता युग की शुरुआत में, जीवन वायु के स्थान से, जो मेरा हृदय है, वैदिक ज्ञान तीन भागों में प्रकट हुआ - ऋग, साम और यजु के रूप में। उसके बाद, उस ज्ञान से मैं तीन यज्ञों के रूप में प्रकट हुआ।
 
O most fortunate one, at the beginning of the Treta Yuga, from the seat of Prana, which is my heart, Vedic knowledge manifested in three divisions—these are Rig, Sama and Yajuh. Thereafter from that knowledge I manifested in the form of the three Yajnas.
तात्पर्य
त्रेता-युग में धर्म का बैल एक पैर खो देता है, और केवल पचहत्तर प्रतिशत धार्मिक सिद्धांत, जो तीन प्रमुख वेदों - ऋग, साम और यजुर द्वारा दर्शाए जाते हैं, प्रकट होते हैं। भगवान त्रिगुणात्मक वैदिक यज्ञ की प्रक्रिया में प्रकट होते हैं। तीन विभागों को इस प्रकार समझा जाता है। होता पुजारी अग्नि में आहुतियाँ देता है और ऋग वेद का जाप करता है। उद्गाता पुजारी साम वेद का जाप करता है। और अध्वर्यु पुजारी, जो यज्ञ स्थल, वेदी इत्यादि की व्यवस्था करता है, यजुर्वेद का जाप करता है। त्रेता-युग में ऐसा यज्ञ आध्यात्मिक पूर्णता के लिए अधिकृत प्रक्रिया है। इस श्लोक में प्राणात शब्द ईश्वर के व्यक्तित्व के सार्वभौमिक रूप को दर्शाता है। इस रूप को आगे के श्लोकों में वर्णित किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)