श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 17: भगवान् कृष्ण द्वारा वर्णाश्रम प्रणाली का वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.17.10 
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृत: ।
कृतकृत्या: प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदु: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
आरंभ में, सत्युग में केवल एक ही सामाजिक वर्ग था, जिसे हंस कहा जाता था और जिसमें सभी मनुष्य होते थे। उस युग में सभी लोग जन्म से ही भगवान के शुद्ध भक्त होते थे और इसलिए विद्वान इस पहले युग को कृत-युग कहते हैं, यानी कि वह युग जिसमें सभी धार्मिक कर्तव्यों का पूरी तरह से पालन किया जाता था।
 
Initially in Satya Yuga there was only one social category called Hans to which all human beings belonged. In that Yuga all the people were pure devotees of God by birth, therefore learned people call this first Yuga as Krita Yuga i.e. an Yuga in which all religious works are completed properly.
तात्पर्य
इस श्लोक से यह समझा जाता है कि सर्वोच्च धार्मिक सिद्धांत भगवान को सर्वोच्च व्यक्तित्व को पूर्ण समर्पण करना है। सतयुग में प्रकृति के निचले आध्यात्मिक शक्तियों का कोई प्रभाव नहीं है, और इसलिए सभी मनुष्य सर्वोच्च सामाजिक व्यवस्था से संबंधित होते हैं, जिसे हंस कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति भगवान के व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण के अंतर्गत आता है। आधुनिक युग में लोग सामाजिक समानता का रोना रो रहे हैं, लेकिन जब तक सभी मनुष्य भलाई के तरीके में नहीं हैं, जो पवित्रता और बिना किसी समर्पण के भक्ति की स्थिति है, सामाजिक समानता संभव नहीं है। जैसे-जैसे प्रकृति के निचले तरीके प्रमुख होते जाएंगे, माध्यमिक धार्मिक सिद्धांत उभरते हैं, जिसके द्वारा लोगों को धीरे-धीरे ईश्वर को बिना किसी समर्पण की शुद्ध अवस्था में ऊपर उठाया जा सकता है। सतयुग में कोई निम्न मनुष्य नहीं हैं, और इस प्रकार माध्यमिक धार्मिक सिद्धांतों की कोई आवश्यकता नहीं है। हर कोई सीधे भगवान की सभी धार्मिक बाध्यताओं को पूर्ण करने के लिए निरंतर सेवा लेता है। संस्कृत में, जो पूरी तरह से सभी कर्तव्यों को निष्पादित करता है उसे कृत-कृत्यू कहा जाता है, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है। इसलिए सतयुग को कृत-युग या संपूर्ण धार्मिक क्रिया की आयु कहा जाता है। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, ādau ("शुरुआत में") शब्द सार्वभौमिक सृजन के क्षण को संदर्भित करता है। दूसरे शब्दों में, वर्णाश्रम प्रणाली हाल ही में concoction नहीं है, लेकिन स्वाभाविक रूप से सृजन के समय उत्पन्न होती है और इसलिए सभी बुद्धिमान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)