श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, इससे पहले आपने वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुयायियों तथा साधारण अनियमित मनुष्यों द्वारा भी अनुसरण किए जाने वाले भक्ति के सिद्धांतों का वर्णन किया है। हे कमलनयन, अब कृपा करके मुझे बताइए कि ये सभी मनुष्य अपने निर्धारित कर्तव्यों को निभाकर आपकी प्रेममयी सेवा कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
Sri Uddhava said: O Lord, earlier you have described the principles of devotion to be followed by the followers of the Varnashrama system as well as by ordinary irregular men. O lotus-eyed one, now kindly tell me how all men can attain Your loving devotion by performing these prescribed duties.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण ने ज्ञान-योग, भक्ति-योग और अष्टांग-योग की प्रक्रिया को विस्तृत रूप से समझाया है। अब उद्धव पूछते हैं कि कर्म-योग की ओर प्रवृत्ति रखने वाले लोग कैसे जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं, कृष्ण चेतना प्राप्त कर सकते हैं। भगवद्-गीता (4.13) में भगवान कृष्ण बताते हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से वर्णाश्रम व्यवस्था के निर्माता हैं। चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः। इसलिए वर्णाश्रम व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य परमेश्वर को प्रसन्न करना है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को प्रभु का भक्त बनना चाहिए और शुद्ध भक्ति सेवा की प्रक्रिया सीखनी चाहिए। प्रभु के शुद्ध भक्तों के संग में रहकर शुद्ध भक्ति सेवा प्राप्त करने का सबसे आसान तरीका है। यदि व्यक्ति विनम्रता और श्रद्धा से प्रभु के शुद्ध भक्तों के साथ रहता है, तो वह तुरंत जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकता है। कृष्ण चेतन व्यक्ति को वर्णाश्रम व्यवस्था की सभी औपचारिकताओं को निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक कृष्ण-चेतन व्यक्ति, ईश्वर के प्रेम में लीन होकर, स्वतः ही सभी इंद्रिय तृप्ति और मानसिक अटकलों को त्याग देता है। जो मानव वर्णाश्रम व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं, उन्हें यहाँ द्वी-पादम या दो पैरों वाला कहा गया है। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति जीवन के धार्मिक मार्ग का पालन नहीं करता, उसे केवल दो पैर रखने से मानव माना जाता है। यहाँ तक कि सामान्य पशु और कीट भी खाने, सोने, संभोग करने और बचाव करने में उत्सुकता से लगे रहते हैं; हालाँकि, मनुष्य धार्मिक बनने और अंततः शुद्ध कृष्ण चेतना में भगवान से प्रेम करने की अपनी क्षमता से जीवन के ऐसे निम्न रूपों से अलग है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥