हे उद्धव, मैं समस्त जीवों के हृदय में बसने वाला परमात्मा हूँ। इसलिए मैं स्वभाविक रूप से उनका शुभचिंतक और सर्वोच्च नियंत्रक हूँ। सृष्टि का निर्माण करने वाला, उसका पालन करने वाला और फिर उसे नष्ट करने वाला मैं ही हूँ, और मैं इन जीवों से अलग नहीं हूँ।
O Uddhava, I am the Supreme Being of all beings, and therefore I am naturally their well-wisher and supreme controller. Being the creator, maintainer and destroyer of all beings, I am not different from them.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि भगवान सभी संपत्तियों या गुणों के साथ विलक्षण और आत्मिक संबंध रखते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान सभी जीवों से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि वे उन्हीं से आते हैं और उनके ही हैं। भगवान ने अर्जुन को भी भगवद-गीता (10.20) के दसवें अध्याय में ऐसा ही स्पष्टीकरण दिया था, जहाँ वही शब्द लिखे हैं, अहम् आत्मा। यद्यपि भगवान अपनी बाहरी या भौतिक संपत्तियों का वर्णन करते हैं, भगवान की स्थिति सदैव पारलौकिक और अलौकिक होती है। जैसे शरीर के अंदर की आत्मा शरीर को जीवन प्रदान करती है, उसी प्रकार भगवान अपनी श्रेष्ठतम क्षमता से सभी सार्वभौमिक संपत्तियों को जीवन प्रदान करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥