श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  11.16.43 
यो वै वाङ्‍मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यति: ।
तस्य व्रतं तपो दानं स्रवत्यामघटाम्बुवत् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
जो योगी अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा अपनी वाणी और मन को पूर्ण रूप से वश में नहीं कर पाता, उसके आध्यात्मिक संकल्प, तपस्या और दान ऐसे ही व्यर्थ हो जाते हैं जैसे कच्ची मिट्टी के घड़े से पानी बह जाता है।
 
A yogi who does not exercise full control over his speech and mind through his superior intellect, his spiritual vows, austerities and alms-giving flow away like water from an unbaked clay pot.
तात्पर्य
जब मिटटी के बर्तन को अच्छी तरह पकाया जाता है तो वह बिना किसी रिसाव के कोई भी द्रव पदार्थ को संभालता है। हालाँकि, अगर मिटटी के बर्तन को ठीक से नहीं पकाया जाता है तो, उसमें मौजूद पानी या कोई अन्य द्रव रिसकर बाहर निकल जाएगा और नष्ट हो जाएगा। इसी तरह, एक आध्यात्मिक व्यक्ति जो अपनी वाणी और दिमाग पर नियंत्रण नहीं रख पाता है वह पाएगा कि उसका आध्यात्मिक अनुशासन और संयम धीरे-धीरे रिसता जा रहा है और नष्ट हो रहा है। 'दान' दूसरों के कल्याण के लिए किए जाने वाले काम को दर्शाता है। जो लोग कृष्ण चेतना का प्रचार करके सबसे बड़ा दान देने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें सुंदर महिलाओं की संतुष्टि के लिए चतुराई से बात नहीं करनी चाहिए, न ही उन्हें केवल सांसारिक अकादमिक प्रतिष्ठा के लिए कृत्रिम रूप से बुद्धिमान बनने का प्रयास करना चाहिए। किसी को भी अंतरंग यौन संबंधों के बारे में नहीं सोचना चाहिए और न ही किसी प्रतिष्ठित पद को प्राप्त करने के बारे में दिवास्वप्न देखना चाहिए। अन्यथा, कृष्ण चेतना का सख्ती से पालन करने का उसका दृढ़ संकल्प नष्ट हो जाएगा, जैसा कि यहाँ वर्णित किया गया है। व्यक्ति को अपनी बुद्धि से दिमाग, इंद्रियों और वाणी को नियंत्रित करना चाहिए ताकि उसका जीवन सफल हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)