वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च ।
आत्मानमात्मना यच्छ न भूय: कल्पसेऽध्वने ॥ ४२ ॥
अनुवाद
इसलिए अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें, अपने मन को वश में करें, जीवन ऊर्जा पर विजय प्राप्त करें, इंद्रियों को नियंत्रित करें और शुद्ध बुद्धि के माध्यम से अपनी तार्किक क्षमताओं को नियंत्रित करें। इस तरह आप भौतिक अस्तित्व के मार्ग पर फिर कभी नहीं गिरेंगे।
Therefore, control your speech, subdue your mind, conquer your breath, regulate your senses and bring your discriminative faculty under your control through a clear intellect. In this way, you will never again stray from the path of the material world.
तात्पर्य
सब प्रकार की वस्तुओं को भगवान की शक्ति के विस्तार के रूप में देखना चाहिए, और इस प्रकार वाणी, मन और इंद्रियों के सहित सभी प्रकार की वस्तुओं का सम्मान करना चाहिए, बिना किसी जीवित प्राणी या भौतिक वस्तु को कमतर माने। चूंकि हर वस्तु भगवान से संबंधित है, इसलिए सभी को अंततः भगवान की सेवा में बड़ी सावधानी के साथ लगाना चाहिए। एक आत्म-साक्षात्कृत भक्त व्यक्तिगत अपमान को सहन करता है और किसी भी जीवित प्राणी से ईर्ष्या नहीं करता है, और न ही वह किसी को अपना शत्रु मानता है। यही व्यावहारिक ज्ञान है। यद्यपि एक विशुद्ध भक्त उन लोगों की आलोचना कर सकता है जो भगवान के मिशन में बाधा डालते हैं, पर ऐसी आलोचना कभी भी व्यक्तिगत रूप से प्रेरित नहीं होती है और न ही यह कभी भी ईर्ष्या पर आधारित होती है। भगवान के एक उन्नत भक्त अपने अनुयायियों को दंडित कर सकते हैं या राक्षसी की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन केवल भगवान के मिशन को पूरा करने के लिए और कभी भी व्यक्तिगत शत्रुता या ईर्ष्या से नहीं। जो व्यक्ति भौतिक जीवन की अवधारणा को पूरी तरह से त्याग देता है उसके लिए जन्म और मृत्यु के मार्ग पर फिर से प्रवेश करने की कोई संभावना नहीं होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥