श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस श्लोक पर निम्न प्रकार से टिप्पणी करते हैं। "भगवान की बाहरी संपन्नताएं मनो-विकार कहलाती हैं, या 'मानसिक परिवर्तन से सबंधित,' क्योंकि साधारण लोग भौतिक दुनिया की असाधारण विशेषताओं को अपने मन की व्यक्तिगत अवस्था के अनुसार समझते हैं। इस प्रकार वाचाभिधीयेत शब्द बताता है कि अनुकूलित आत्माएं भगवान की भौतिक सृष्टि को विशिष्ट भौतिक परिस्थितियों के अनुसार बताती हैं। भौतिक संपन्नता की सापेक्षिक परिस्थितिजन्य परिभाषाओं के कारण, ऐसी संपन्नता को भगवान के व्यक्तिगत रूप की प्रत्यक्ष पूर्ण अभिव्यक्ति कभी नहीं माना जाना चाहिए। जब किसी की मनोदशा अनुकूल या स्नेहपूर्ण अवस्था में बदल जाती है, तो वह भगवान की ऊर्जा की अभिव्यक्ति को 'मेरा पुत्र', 'मेरे पिता', 'मेरा पति', 'मेरे चाचा', 'मेरे भाई का बेटा', 'मेरा मित्र' आदि के रूप में परिभाषित करता है। वह भूल जाता है कि वास्तव में हर जीवित इकाई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का अंग है और जो भी संपन्नताएं, प्रतिभा या विशेषताएं हो सकते हैं, वे वास्तव में भगवान की शक्ति हैं। इसी तरह, जब मन एक नकारात्मक या शत्रुतापूर्ण अवस्था में बदल जाता है, तो व्यक्ति सोचता है, 'यह व्यक्ति मेरी बर्बादी बन जाएगा,' 'इस व्यक्ति को मुझे खत्म करना होगा,' 'वह मेरा दुश्मन है' या 'मैं उसका दुश्मन हूं,' 'वह एक हत्यारा है' या 'उसे मार डाला जाना चाहिए'। जब व्यक्ति विशेष लोगों या वस्तुओं के असाधारण भौतिक पहलुओं की ओर आकर्षित होता है, लेकिन भूल जाता है कि वे भगवान के व्यक्तित्व की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो मन की नकारात्मक स्थिति भी व्यक्त होती है। यहां तक कि देवता इंद्र, जो कि भगवान के भौतिक संपन्नता की अभिव्यक्ति है, को दूसरों द्वारा गलत समझा जाता है। उदाहरण के लिए, इंद्र की पत्नी, शची, सोचती है कि इंद्र 'मेरे पति' हैं, जबकि अदिति सोचती है कि वह 'मेरा बेटा' है। जयंत सोचता है कि वह 'मेरे पिता' हैं, बृहस्पति सोचते हैं कि वह 'मेरे शिष्य' हैं, जबकि राक्षसों को लगता है कि इंद्र उनके व्यक्तिगत दुश्मन हैं। इस प्रकार अलग-अलग व्यक्तित्व उनकी मानसिक स्थिति के अनुसार उसे परिभाषित करते हैं। भगवान की भौतिक संपन्नता, जो कि अपेक्षाकृत कथित है, इसलिए मनो-विकार कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे मानसिक अवस्थाओं पर निर्भर हैं। यह सापेक्ष धारणा भौतिक है क्योंकि यह सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को किसी विशेष संपन्नता के वास्तविक स्रोत के रूप में नहीं पहचानता है। यदि कोई भगवान कृष्ण को सभी संपन्नता का स्रोत देखता है और भगवान की संपन्नताओं का आनंद लेने या उन पर अधिकार करने की सभी इच्छाओं को छोड़ देता है, तो कोई उनकी आध्यात्मिक प्रकृति को देख सकता है। उस समय, भले ही कोई भौतिक दुनिया की विविधता और भेद को समझना जारी रख सकता है, लेकिन वह कृष्णभावना में पूर्ण हो जाएगा। किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, जैसा कि शून्यवादी दार्शनिक करते हैं, कि विष्णु-तत्व और मुक्त जीव श्रेणियों में भगवान की आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ भी सापेक्ष धारणा और मानसिक अवस्थाओं के उत्पाद हैं। यह बेकार विचार भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की श्री उद्धव को शिक्षाओं के पूरे शरीर के विपरीत है। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, वाचा शब्द विभिन्न वैदिक साहित्यों को भी इंगित करता है जो उन विशेष प्रक्रियाओं का वर्णन करते हैं जिनके द्वारा भगवान अपनी आध्यात्मिक और भौतिक संपन्नता को प्रकट करते हैं, और इस संदर्भ में यथा अभिव्यक्ति और सृष्टि की विशिष्ट प्रक्रियाओं को इंगित करता है।
