श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  11.16.41 
एतास्ते कीर्तिता: सर्वा: सङ्‍क्षेपेण विभूतय: ।
मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
मैंने तुमसे संक्षेप में अपनी सभी आध्यात्मिक सम्पदाओं और अपनी सृष्टि के उन अद्वितीय भौतिक गुणों का वर्णन किया, जिन्हें मन से अनुभव किया जाता है और परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया जाता है।
 
I have also briefly described to you all My spiritual opulences and the unique physical qualities of My creation, which are perceived by the mind and are defined in different ways according to circumstances.
तात्पर्य
संस्कृत व्याकरण के अनुसार, और जैसा श्रील श्रीधर स्वामी द्वारा पुष्टि की गई है, "एताः" और "एते" शब्द भगवान की संपन्नियों के दो अलग-अलग समूहों का वर्णन करते हैं। भगवान ने अपने संपन्नपूर्ण पूर्ण अवतारों, जैसे वासुदेव, नारायण, परमआत्मा आदि का वर्णन किया है, और आगे भगवान ने भौतिक सृष्टि की उत्कृष्ट विशेषताओं का वर्णन किया है, जो भगवद् व्यक्तित्व की महिमा में भी शामिल हैं। भगवान के पूर्णावतार, जैसे वासुदेव, नारायण आदि, भगवान की सभी शाश्वत, अपरिवर्तनीय अनुपम विशेषताएँ हैं और इन्हें "एताः" शब्द से इंगित किया जाता है। हालाँकि, भौतिक सृष्टि के असाधारण पहलू परिस्थितिजन्य हैं और व्यक्तिगत धारणा पर निर्भर हैं, और इसलिए उन्हें यहाँ "मनो-विकार एवैते यथा वाचाभिधीयते" शब्दों द्वारा वर्णित किया गया है। श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं कि समानार्थक शब्दों के निरंतर तार्किक अनुप्रयोग से, "एताः" भगवान की शाश्वत आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों को संदर्भित करता है, जो भौतिक इंद्रियों की धारणा से परे हैं, जबकि "एते" उन संपन्नियों को संदर्भित करता है जिन्हें सशर्त आत्माओं द्वारा माना जा सकता है। वह उदाहरण देते हैं कि किसी राजा के उपकरण और घनिष्ठ सहयोगी सभी को राजा का अभिन्न अंग माना जाता है और इसलिए उन्हें शाही दर्जा दिया जाता है। इसी तरह, भौतिक सृष्टि की संपन्न विशेषताएँ भगवान की व्यक्तिगत संपन्नियों के परावर्तित विस्तार हैं और इसलिए उन्हें उनसे भिन्न नहीं माना जा सकता है। हालाँकि, किसी को यह गलत तरीके से नहीं मान लेना चाहिए कि ऐसी незначительные भौतिक संपन्नताएँ भगवान की पूर्ण विशेषताओं के समान दर्जा रखती हैं, जो भगवान के समकक्ष गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से भगवद् व्यक्तित्व हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस श्लोक पर निम्न प्रकार से टिप्पणी करते हैं। "भगवान की बाहरी संपन्नताएं मनो-विकार कहलाती हैं, या 'मानसिक परिवर्तन से सबंधित,' क्योंकि साधारण लोग भौतिक दुनिया की असाधारण विशेषताओं को अपने मन की व्यक्तिगत अवस्था के अनुसार समझते हैं। इस प्रकार वाचाभिधीयेत शब्द बताता है कि अनुकूलित आत्माएं भगवान की भौतिक सृष्टि को विशिष्ट भौतिक परिस्थितियों के अनुसार बताती हैं। भौतिक संपन्नता की सापेक्षिक परिस्थितिजन्य परिभाषाओं के कारण, ऐसी संपन्नता को भगवान के व्यक्तिगत रूप की प्रत्यक्ष पूर्ण अभिव्यक्ति कभी नहीं माना जाना चाहिए। जब किसी की मनोदशा अनुकूल या स्नेहपूर्ण अवस्था में बदल जाती है, तो वह भगवान की ऊर्जा की अभिव्यक्ति को 'मेरा पुत्र', 'मेरे पिता', 'मेरा पति', 'मेरे चाचा', 'मेरे भाई का बेटा', 'मेरा मित्र' आदि के रूप में परिभाषित करता है। वह भूल जाता है कि वास्तव में हर जीवित इकाई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का अंग है और जो भी संपन्नताएं, प्रतिभा या विशेषताएं हो सकते हैं, वे वास्तव में भगवान की शक्ति हैं। इसी तरह, जब मन एक नकारात्मक या शत्रुतापूर्ण अवस्था में बदल जाता है, तो व्यक्ति सोचता है, 'यह व्यक्ति मेरी बर्बादी बन जाएगा,' 'इस व्यक्ति को मुझे खत्म करना होगा,' 'वह मेरा दुश्मन है' या 'मैं उसका दुश्मन हूं,' 'वह एक हत्यारा है' या 'उसे मार डाला जाना चाहिए'। जब व्यक्ति विशेष लोगों या वस्तुओं के असाधारण भौतिक पहलुओं की ओर आकर्षित होता है, लेकिन भूल जाता है कि वे भगवान के व्यक्तित्व की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो मन की नकारात्मक स्थिति भी व्यक्त होती है। यहां तक ​​कि देवता इंद्र, जो कि भगवान के भौतिक संपन्नता की अभिव्यक्ति है, को दूसरों द्वारा गलत समझा जाता है। उदाहरण के लिए, इंद्र की पत्नी, शची, सोचती है कि इंद्र 'मेरे पति' हैं, जबकि अदिति सोचती है कि वह 'मेरा बेटा' है। जयंत सोचता है कि वह 'मेरे पिता' हैं, बृहस्पति सोचते हैं कि वह 'मेरे शिष्य' हैं, जबकि राक्षसों को लगता है कि इंद्र उनके व्यक्तिगत दुश्मन हैं। इस प्रकार अलग-अलग व्यक्तित्व उनकी मानसिक स्थिति के अनुसार उसे परिभाषित करते हैं। भगवान की भौतिक संपन्नता, जो कि अपेक्षाकृत कथित है, इसलिए मनो-विकार कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे मानसिक अवस्थाओं पर निर्भर हैं। यह सापेक्ष धारणा भौतिक है क्योंकि यह सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान को किसी विशेष संपन्नता के वास्तविक स्रोत के रूप में नहीं पहचानता है। यदि कोई भगवान कृष्ण को सभी संपन्नता का स्रोत देखता है और भगवान की संपन्नताओं का आनंद लेने या उन पर अधिकार करने की सभी इच्छाओं को छोड़ देता है, तो कोई उनकी आध्यात्मिक प्रकृति को देख सकता है। उस समय, भले ही कोई भौतिक दुनिया की विविधता और भेद को समझना जारी रख सकता है, लेकिन वह कृष्णभावना में पूर्ण हो जाएगा। किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, जैसा कि शून्यवादी दार्शनिक करते हैं, कि विष्णु-तत्व और मुक्त जीव श्रेणियों में भगवान की आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ भी सापेक्ष धारणा और मानसिक अवस्थाओं के उत्पाद हैं। यह बेकार विचार भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की श्री उद्धव को शिक्षाओं के पूरे शरीर के विपरीत है। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, वाचा शब्द विभिन्न वैदिक साहित्यों को भी इंगित करता है जो उन विशेष प्रक्रियाओं का वर्णन करते हैं जिनके द्वारा भगवान अपनी आध्यात्मिक और भौतिक संपन्नता को प्रकट करते हैं, और इस संदर्भ में यथा अभिव्यक्ति और सृष्टि की विशिष्ट प्रक्रियाओं को इंगित करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)