श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  11.16.40 
तेज: श्री: कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्याग: सौभगं भग: ।
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेंऽशक: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
जो भी शक्ति, सौंदर्य, यश, ऐश्वर्य, विनम्रता, त्याग, मानसिक आनंद, सौभाग्य, शक्ति, सहनशीलता या आध्यात्मिक ज्ञान हो सकता है, वह सब मेरे ऐश्वर्य का विस्तार मात्र है।
 
Whatever may be power, beauty, fame, prosperity, humility, sacrifice, mental bliss, good fortune, strength, tolerance or spiritual knowledge, it is all a part of My opulence.
तात्पर्य
यद्यपि भगवान ने पिछले श्लोक में कहा है कि उनकी समृद्धियाँ असंख्य हैं, भगवान यहाँ एक विशिष्ट सारांश और अपनी समृद्धियों का प्रदर्शन करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)