श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.16.4 
गूढश्चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन ।
न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे पालनहार प्रभु, आप सभी जीवों की आत्मा हैं, परन्तु आप गुप्त रहते हैं। इस प्रकार, आपके द्वारा मोहित होकर जीव आपको नहीं देख पाते, जबकि आप उन्हें देखते रहते हैं।
 
O Lord who protects all, although You are the Supreme Soul of all beings, You remain hidden. Thus, beings, being bewildered by You, are unable to see You, even though You keep seeing them.
तात्पर्य
भगवान प्रत्येक वस्तु में परमात्मा के रूप में विद्यमान रहते हैं। वे स्वयं विभिन्न अवतारों में भी प्रकट होते हैं या कभी-कभी अवतार के रूप में कार्य करने के लिए किसी भक्त को अधिकार देते हैं। भगवान के ऐसे सभी रूपों को अधर्मियों द्वारा नहीं पहचाना जा सकता। भ्रमित बद्ध आत्माएँ यह सोचती हैं कि परम भोगी, श्री कृष्ण, वास्तव में उनके द्वारा उनके इंद्रिय-संतुष्टि के लिए भोगे जाने हैं। भगवान से विशेष भौतिक वरदानों के लिए प्रार्थना करना और भगवान की सृष्टि को अपनी निजी संपत्ति मान लेना, अधर्मी भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ सकते हैं। इसलिए वे मूर्ख और भ्रमित बने रहते हैं। संसार में प्रत्येक वस्तु सृष्टि, संरक्षण और विनाश के अधीन है, और इस प्रकार परमात्मा ही भौतिक दुनिया में एकमात्र वास्तविक नियंत्रक है। दुर्भाग्य से, जब परमात्मा अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं, तो अज्ञानी व्यक्ति यह सोचते हैं कि परमात्मा भौतिक प्रकृति की अवस्थाओं की केवल एक रचना है। जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, वे उस व्यक्ति को नहीं देख सकते हैं जो वास्तव में उन्हें देख रहा है, और केवल भ्रमित ही बने रहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)