जीव, प्रकृति के गुणों और महत्-तत्त्व के मूल के रूप में परमेश्वर मैं ही हूँ। इसलिए, मैं सब कुछ हूँ और मेरे बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता।
As the Supreme Lord I am the basis of the living entities, the modes of nature and the Mahat-tattva. Thus I am the all-pervading and nothing can exist without me.
तात्पर्य
महत्-तत्व या कुल भौतिक सत्ता और जीव अथवा जीवित सत्ता की अभिव्यक्ति के बिना भौतिक जगत् में कुछ भी अस्तित्वमान नहीं हो सकता। हमारा अनुभव की गई हर चीज़ जीवित सत्ता और पदार्थ का मेल है, जो सूक्ष्म और स्थूल श्रेणियों में है। परम देव भगवान जीवित सत्ता और पदार्थ दोनों के अस्तित्व का सम्पूर्ण आधार है। परम प्रभु की कृपा के बिना एक क्षण भी कुछ भी अस्तित्वमान नहीं हो सकता है। किसी को भी मूर्खता से यह नहीं मान लेना चाहिए कि भगवान इसलिए भौतिक है। जैसा कि भागवतम के इस काण्ड में स्पष्ट रूप से समझाया गया है, जीवित सत्ता और परम प्रभु दोनों ही भौतिक प्रकृति से पूरी तरह से पारमार्थिक हैं। यद्यपि जीवित सत्ता में यह भाव होता है कि वह भौतिक है, जबकि प्रभु लगातार खुद के और शर्तों के अनुसार स्वप्न देखने वाली सत्ता दोनों की पारमार्थिक स्थिति को याद करते हैं। जैसे कि प्रभु पारमार्थिक है, उनका निवास भी प्रकृति के गुणों की पहुंच से बाहर है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य है परम प्रभु, उनके पारमार्थिक निवास, हमारी अपनी पारमार्थिक स्थिति और प्रक्रिया को परिपक्व आस्था के अनुसार समझना जिसके द्वारा हम वापस घर, परमात्मा के पास जा सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥