श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  11.16.37 
पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान् ।
विकार: पुरुषोऽव्यक्तं रज: सत्त्वं तम: परम् ।
अहमेतत्प्रसङ्ख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चय: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं स्वरूप, स्वाद, गंध, स्पर्श और ध्वनि हूं; मिथ्या अहंकार और महत्तत्त्व भी मैं ही हूँ। मैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हूं; जीवात्मा और भौतिक प्रकृति भी मैं ही हूं। मैं सत्व, रज और तम गुण हूं; और मैं दिव्य भगवान हूं। ये सभी चीजें, उनके व्यक्तिगत लक्षणों का ज्ञान और इस ज्ञान से उत्पन्न दृढ़ विश्वास, मेरा ही प्रतिनिधित्व करते हैं।
 
I form, taste, smell, touch and sound; False ego, important principle; Earth, water, fire, air and sky; Jiva, material nature; sato, rajo and tamo gunas; And I am a divine God. I am all these things, their characteristics and the determination arising from this knowledge.
तात्पर्य
इस संसार में अपने निजी वैभव का संक्षिप्त पर विस्तृत सारांश देने के बाद अब ईश्वर उन वैभवों का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत करते हैं जो उनकी साकार ज्योति से प्रवृत्त होते हैं। ब्रह्म संहिता में कहा गया है कि अपनी विविधताओं, परिवर्तनों और वैभव के साथ समस्त भौतिक ब्रह्मांड ईश्वर की साकार ज्योति पर टिके हैं। श्रीला जीव गोस्वामी ने इस श्लोक पर अपनी टीका में इस बिंदु को विस्तृत रूप से समझाया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)