श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.16.33 
विश्वावसु: पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम् ।
भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुव: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
गंधर्वों में मैं विश्वावसु हूं, और स्वर्गीय अप्सराओं में मैं पूर्वचित्ति हूं। मैं पर्वतों की स्थिरता हूं और पृथ्वी की सुगंध हूं।
 
I am Vishwavasu among the Gandharvas and Purvachitti among the heavenly Apsaras. I am the stability of the mountains and the fragrance of the earth.
तात्पर्य
भागवद्-गीता (7.9) में भगवान कृष्ण कहते है, पुण्यो गंधः पृथिव्यां च : "मैं पृथ्वी की सुगंध हूँ।" पृथ्वी की वास्तविक सुगंध बहुत ही मनभावन होती है और भगवान कृष्ण का प्रतिनिधित्व करती है। हालाँकि अप्रिय सुगंध कृत्रिम रूप से उत्पन्न की जा सकती है, वे भगवान का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)