श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  11.16.24 
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम् ।
आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्प: ख्यातिवादिनाम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
योग की आठ उत्तरोत्तर अवस्थाओं में से मैं अंतिम अवस्था हूँ, जिसे समादि कहते हैं। समादि में आत्मा पूरी तरह से मोह से मुक्त हो जाती है। जीतने वालों में मैं बुद्धिमान राजनीतिक सलाहकार हूँ और विवेकशील लोगों के बीच मैं आत्मज्ञान हूँ, जिससे व्यक्ति आत्मा और पदार्थ में अंतर कर सकता है। सभी दार्शनिकों में मैं अनुभूति की विविधता हूँ।
 
I am the last of the eight successive stages of Yoga—samadhi—in which the Self is completely detached from attachment. Among those who aspire for victory I am the skilful political adviser, and among the skilful discerning methods I am self-knowledge by which the Self is distinguished from matter. I am the diversity of experience among all impersonalists (jnanis).
तात्पर्य
किसी भी विज्ञान का आधार विशेषज्ञीय विभेदन की शक्ति है। पृथक और अंतःक्रियाशील घटकों की कुशल परिभाषा द्वारा कोई भी किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञ बन जाता है। अंततः सबसे बुद्धिमान व्यक्ति आत्मा को पदार्थ से अलग कर सकता है और पदार्थ और आत्मा दोनों के पृथक और अंतःक्रियाशील घटकों के रूप में गुणों का वर्णन कर सकता है। अनगिनत दार्शनिक अटकलों का प्रसार भौतिक दुनिया के भीतर बोध के विभिन्न तरीकों के कारण है। जैसा कि भगवद्-गीता (15.15) में कहा गया है, सर्वस्य चहं हृदय संनिविस्टो मत्त स्मृतिर् ज्ञानं अपोहनं च: भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हर किसी के हृदय में स्थित हैं और किसी की इच्छा और योग्यता के अनुसार ज्ञान या अज्ञान की एक विशेष डिग्री प्रदान करते हैं। इस प्रकार स्वयं भगवान दार्शनिक अटकलों की सांसारिक प्रक्रिया का आधार हैं, क्योंकि वह वातानुकूलित आत्माओं के भीतर बोध के विभिन्न और वैकल्पिक तरीके बनाते हैं। यह समझा जाना चाहिए कि कोई केवल भगवान कृष्ण से सीधे सुनकर ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है, न कि अनुकूलित दार्शनिकों से सुनकर जो व्यक्तिगत इच्छाओं की स्क्रीन के माध्यम से भगवान के निर्माण को अपूर्ण रूप से देखते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)