श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  11.16.1 
श्रीउद्धव उवाच
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम् ।
सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्भ‍व: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री उद्धव ने कहा: हे प्रभु, आप अनादि और अनंत हैं, स्वयं परम ब्रह्म हैं, और किसी अन्य चीज से सीमित नहीं हैं। आप सभी वस्तुओं के रक्षक और जीवनदाता हैं, और उनके विनाश और निर्माण भी आप ही हैं।
 
Sri Uddhava said: O Lord, You are eternal and infinite, the Supreme Brahman Himself, and not limited by anything else. You are the preserver and life-giver of all things, their destroyer and creation.
तात्पर्य
ब्रह्मा का अर्थ है सभी में श्रेष्ठ और सभी का कारण। उद्धव ने यहाँ भगवान को परम या सर्वोच्च ब्रह्म कहकर संबोधित किया है, क्योंकि भागवत रूप में प्रभु परम सत्य के सर्वोच्च रूप हैं और असीमित आध्यात्मिक संपदाओं का आश्रय हैं। साधारण जीवों की भाँति भगवान की संपदाएँ समय से सीमित नहीं हैं, और इस प्रकार भगवान अनादि-अंत हैं, जिनकी कोई शुरुआत या अंत नहीं है, और अपावृत हैं, किसी भी श्रेष्ठ या समान शक्ति से अबाधित हैं। भौतिक संसार की संपत्ति भी भगवान के भीतर निवास करती है, जो अकेले ही भौतिक जगत की रक्षा, संधारण, सृजन और विनाश कर सकते हैं। इस अध्याय में, श्री उद्धव भगवान से उनकी आध्यात्मिक और भौतिक संपदाओं के बारे में पूछताछ करते हैं ताकि परम सत्य के रूप में भगवान की स्थिति की अपनी प्रशंसा को परिष्कृत किया जा सके। भौतिक जगत के अंतिम रचयिता भगवान विष्णु भी भगवान कृष्ण का विस्तार हैं, और इसलिए श्री उद्धव अपने निजी मित्र की विशिष्ट स्थिति की पूरी तरह से सराहना करना चाहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)