श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  11.15.8-9 
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता ।
अग्‍न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजय: ॥ ८ ॥
एताश्चोद्देशत: प्रोक्ता योगधारणसिद्धय: ।
यया धारणया या स्याद् यथा वा स्यान्निबोध मे ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने की शक्ति; गर्मी, सर्दी और अन्य द्वंद्वों को सहन करने की शक्ति; दूसरों के मन को जानना; आग, सूर्य, पानी, जहर, आदि के प्रभाव को रोकना; और दूसरों द्वारा अपराजित रहना - ये योग और ध्यान की पांच सिद्धियां हैं। मैं उन्हें उनके नामों और गुणों के अनुसार यहां सूचीबद्ध कर रहा हूं। अब कृपया मुझसे सीखें कि कैसे विशिष्ट ध्यान से विशिष्ट रहस्यमय सिद्धियां उत्पन्न होती हैं और इसमें कौन सी विशेष प्रक्रियाएं शामिल हैं।
 
The power to know the past, the present and the future, the power to endure cold and heat and other conflicts, the power to read the minds of others, to resist the effects of fire, sun, water, poison, etc., and not to be defeated by others—these are the five siddhis of yoga and meditation. I am listing them here according to their names and qualities. You may learn from me how special yogic siddhis are produced by special meditation and what special methods are involved in them.
तात्पर्य
आचार्यों के अनुसार, पहले वर्णित इन पाँच सिद्धियों को हीन माना जाता है क्योंकि इनमें शारीरिक और मानसिक छेड़छाड़ शामिल है। श्रील माध्वाचार्य के अनुसार, जिस सिद्धि को agny-arkāmbu-viṣādīnāṁ pratiṣṭambhaḥ, अग्नि-सूर्य-जल-विष आदि के प्रभाव को रोकना, कहा गया है, वहाँ "आदि" शब्द से तात्पर्य इस बात से है कि व्यक्ति हर प्रकार के हथियारों और नाखून, दाँत, पिटाई, शाप आदि से भी अजेय बना रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)