श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  11.15.4-5 
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियै: ।
प्राकाम्यं श्रुतद‍ृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता ॥ ४ ॥
गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति ।
एता मे सिद्धय: सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मता: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
आठ मुख्य योग्यताओं में से तीन योग्यताएँ, जिनसे व्यक्ति अपने शरीर को रूपांतरित कर सकता है, अणिमा (छोटे से छोटा होना), महिमा (बड़े से बड़ा होना) और लघिमा (हल्के से हल्का होना) हैं। उपलब्ध योग्यता से कोई भी इच्छित वस्तु प्राप्त की जा सकती है और आकांक्षित योग्यता से मनुष्य को उस वस्तु का अनुभव इस दुनिया या अगली दुनिया में हो सकता है। नियंत्रण योग्यता से मनुष्य माया की शक्तियों को प्राप्त कर सकता है और वशिता योग्यता से मनुष्य तीनों गुणों से अबाधित हो जाता है। जिसने कामना योग्यता प्राप्त कर ली है, वह कहीं से भी कोई भी चीज़ सर्वोच्च सीमा तक प्राप्त कर सकता है। हे उद्धव, ये आठ योग्यताएँ प्राकृतिक रूप से मौजूद हैं और इस दुनिया में अद्वितीय हैं।
 
Of the eight principal yogic powers, the three siddhis by which a man can transform his body are Anima (becoming smaller than small), Mahima (becoming bigger than big) and Laghima (becoming lighter than light). By Prapti Siddhi one can obtain the desired object and by Prakamya Siddhi one can experience the object desired in this world or the next. By Ishita Siddhi one can obtain the sub-powers of Maya and by Vashita Siddhi one becomes unfettered by the three Gunas. One who has obtained Kamaavasayita Siddhi can obtain anything from anywhere to the highest extent. O Uddhava, these eight yogic powers exist naturally and are unique in this world.
तात्पर्य
अनिमा-सिद्धि द्वारा कोई इतना छोटा हो सकता है कि वह एक पत्थर में प्रवेश कर सके या किसी भी बाधा को पार कर सके। महिमा-सिद्धि द्वारा कोई इतना बड़ा हो जाता है कि वह सब कुछ ढँक देता है, और लग्हिमा द्वारा कोई इतना हल्का हो जाता है कि वह सूर्य की किरणों पर सवारी करके सूर्य ग्रह पर जा सकता है। प्राप्ति-सिद्धि द्वारा कोई कहीं से भी कुछ भी प्राप्त कर सकता है और अपनी उंगली से चंद्रमा को स्पर्श भी कर सकता है। इस रहस्यमय सिद्धि से कोई किसी भी अन्य जीवित इकाई की इंद्रियों में विशेष इंद्रियों के प्रधान देवताओं के माध्यम से प्रवेश कर सकता है; और इस प्रकार दूसरों की इंद्रियों का उपयोग करके, कोई कुछ भी प्राप्त कर सकता है। प्राप्त्य द्वारा कोई इस दुनिया या अगली दुनिया में किसी भी सुखद वस्तु का अनुभव कर सकता है, और ईशित या नियंत्रण करने वाली शक्ति के माध्यम से, कोई माया की उप-शक्तियों को नियंत्रित कर सकता है, जो भौतिक हैं। दूसरे शब्दों में, रहस्यमय शक्तियाँ प्राप्त करने से भी कोई भ्रम के नियंत्रण से बाहर नहीं निकल सकता; हालाँकि, भ्रम की उप-शक्तियों को नियंत्रित कर सकता है। वशिता या नियंत्रित करने की शक्ति द्वारा, कोई दूसरों को अपने अधीन कर सकता है या प्रकृति के तीनों गुणों के नियंत्रण से खुद को दूर रख सकता है। अंततः, कोई कामवासायिता के माध्यम से नियंत्रण, अधिग्रहण और आनंद की अधिकतम शक्तियाँ प्राप्त करता है। इस श्लोक में शब्द उत्पातिः मूल, प्राकृतिक और अप्रतिम होने का संकेत करता है। ये आठ रहस्यमय शक्तियाँ मूल रूप से भगवान कृष्ण, भगवान व्यक्तित्व में, सर्वोच्च स्तर पर विद्यमान हैं। भगवान कृष्ण इतने छोटे हो जाते हैं कि वे परमाणु कणों में प्रवेश कर जाते हैं, और वे इतने बड़े हो जाते हैं कि महा-विष्णु के रूप में वे लाखों ब्रह्मांडों को साँस से बाहर निकालते हैं। भगवान इतने हल्के या सूक्ष्म हो सकते हैं कि महान रहस्यवादी योगी भी उन्हें नहीं देख सकते, और भगवान की अधिग्रहण शक्ति परिपूर्ण है, क्योंकि वे कुल अस्तित्व को हमेशा अपने शरीर में रखते हैं। भगवान निश्चित रूप से जो चाहें उसका आनंद ले सकते हैं, सभी ऊर्जाओं को नियंत्रित कर सकते हैं, अन्य सभी व्यक्तियों पर हावी हो सकते हैं और पूर्ण सर्वशक्तिमानता प्रदर्शित कर सकते हैं। इसलिए यह समझा जाना चाहिए कि ये आठ रहस्यमय पूर्णता भगवान की रहस्यमय शक्ति के महत्वहीन विस्तार हैं, जिन्हें भगवद-गीता में योगेश्वर कहा जाता है, सभी रहस्यमय शक्तियों के सर्वोच्च भगवान। ये आठ पूर्णताएँ कृत्रिम नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक और अप्रतिम हैं क्योंकि वे मूल रूप से भगवान व्यक्तित्व में विद्यमान हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)