श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.15.35 
सर्वासामपि सिद्धीनां हेतु: पतिरहं प्रभु: ।
अहं योगस्य साङ्ख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे उद्धव, मैं सब योग-सिद्धियों, योग-पद्धति, सांख्य ज्ञान, शुद्ध कर्म और सीखे-पढ़े वैदिक गुरुओं का कारण, रक्षक और ईश्वर हूँ।
 
O Uddhava, I am the cause, protector and master of all Yoga accomplishments, Yoga system, Sankhya knowledge, pure actions and the learned Vedic teachers.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, यहाँ योग शब्द भौतिक जीवन से मुक्ति को दर्शाता है, और सांख्य मुक्ति पाने के साधनों को इंगित करता है। इस प्रकार, भगवान कृष्ण केवल भौतिक योग सिद्धियों के भगवान नहीं हैं, बल्कि सर्वोच्च मुक्त सिद्धियों के भी हैं। एक व्यक्ति पवित्र गतिविधियों को करके सांख्य या मुक्ति की ओर ले जाने वाले ज्ञान को प्राप्त कर सकता है, और भगवान कृष्ण ऐसे कार्यों के कारण, रक्षक और भगवान भी हैं और साथ ही साथ विद्वान शिक्षक भी हैं जो आम लोगों को पवित्रता के साधनों के बारे में बताते हैं। कई विभिन्न तरीकों से भगवान कृष्ण प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए ध्यान और पूजा का वास्तविक उद्देश्य हैं। भगवान कृष्ण अपनी शक्तियों के विस्तार के माध्यम से ही सब कुछ हैं, और इस सरल समझ को, कृष्ण चेतना कहा जाता है, योग प्रणाली की सर्वोच्च सिद्धि है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)