जो लोग भक्ति-योग की प्रक्रिया को छोड़ देते हैं और कृष्ण के अलावा अन्य वस्तुओं के लिए ध्यान की दुकानदारी करते हैं, वे निश्चित रूप से बहुत बुद्धिमान नहीं हैं| जो लोग योगी होने का दावा करते हैं परन्तु अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने का पीछा करते हैं, वे निश्चित रूप से कुयोगी या भोगी-योगी हैं| ऐसे कुयोगी यह नहीं समझ पाते कि जिस प्रकार उनकी इन्द्रियाँ छोटी हैं, उसी प्रकार परम सत्य की इन्द्रियाँ परम हैं, और न ही वे यह समझ पाते हैं कि योग वास्तव में भगवान की परम इन्द्रियों को संतुष्ट करने के लिए है| इसलिए, जो लोग कृष्ण के चरण-कमलों को छोड़कर आध्यात्मिक सिद्धि में कथित सुख की खोज करते हैं, वे निस्संदेह अपने प्रयास में निराश होंगे| विशेष रूप से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर ध्यान करने से योग-गति प्राप्त होती है, जो योग का अंतिम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है भगवान कृष्ण के ग्रह पर रहना और वहां आध्यात्मिक ऐश्वर्य का आनंद लेना|
