श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.15.33 
अन्तरायान् वदन्त्येता युञ्जतो योगमुत्तमम् ।
मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतव: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
भक्ति के जानकार विद्वानों का मत है कि मैंने जिन योग सिद्धियों का ज़िक्र किया है, वे योग का अभ्यास करने वाले व्यक्ति के लिए बाधाएँ और समय की बर्बादी है, जिससे वह मुझसे सीधे सभी जीवन सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है।
 
The learned pundits of bhakti say that the yogic perfections that I have mentioned are actually obstacles and a waste of time for a person who practices the supreme yoga by which he receives all the perfections of life directly from Me.
तात्पर्य
सामान्य ज्ञान से ये समझ आता है की जो भी बेकार है समय की बरबादी है उसको त्याग देना चाहिए; इसलिए भगवान से योग सिद्धियों के लिए प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। एक शुद्ध भक्त के लिए, जिसकी कोई भौतिक इच्छा नहीं है, उसके लिए मुक्ति भी उसके जीवन में बेकार परेशानी है, और भौतिक सिद्धियों की बात क्या करें, जिनकी तुलना भी मुक्ति से नहीं की जा सकती। ये सिद्धियाँ केवल अविकसित और अनुभवहीन लोगों के लिए ही चमत्कारी हो सकती हैं, लेकिन एक विद्वान व्यक्ति के लिए, जो परमपुरुष भगवान को जान चुका है, ये सिद्धियाँ कुछ नहीं है। भगवान कृष्ण को पाने से ही व्यक्ति अनंत औपचारिक समृद्धि में वास कर रहा होता है; इसलिए उसे अलग से किसी भौतिक सिद्धियों को पाने में कीमती समय नहीं गँवाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)