श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.15.32 
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुने: ।
मद्धारणां धारयत: का सा सिद्धि: सुदुर्लभा ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जिस मुनि ने अपनी इंद्रियों, श्वास और मन पर विजय प्राप्त कर ली है, जो आत्म-संयमी है और हमेशा मेरी ध्यान में लीन रहता है, उसके लिए कौन सी योग सिद्धि प्राप्त करना कठिन हो सकती है?
 
Which yogic accomplishment is difficult to attain for a sage who has conquered his senses, breath and mind, who is self-controlled and who is always absorbed in My meditation?
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी इस तरह व्याख्या करते हैं । “भगवान कृष्ण यहाँ यह बताते हैं कि अलग-अलग कई प्रकार की प्रक्रियाओं का अभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त में से किसी एक प्रक्रिया को भी पूरी तरह से करने से व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पा लेता है, उनमें लीन हो जाता है और इस प्रकार सभी रहस्यमय सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है ।”

श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि व्यक्ति को भगवान के आध्यात्मिक स्वरूप पर ध्यान करना चाहिए, जो किसी भी भौतिक पदनाम से मुक्त है । योग व्यवस्था में आगे बढ़ने का यही सार है; इस प्रकार व्यक्ति भगवान के व्यक्तिगत शरीर से सभी रहस्यमय सिद्धियाँ बहुत आसानी से प्राप्त कर लेता है ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)