श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.15.30 
मद्विभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्‍त्रविभूषिता: ।
ध्वजातपत्रव्यजनै: स भवेदपराजित: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
मेरा भक्त मेरे उन वैभवशाली अवतारों का ध्यान करके अपराजेय बन जाता है जो श्रीवत्स और विविध हथियारों से अलंकृत होते हैं और राजसी प्रतीकों जैसे ध्वज, सजावटी छतरियाँ और पंखे से युक्त होते हैं।
 
My devotee becomes invincible by meditating upon My glorious incarnations. These incarnations of Mine are adorned with the Srivatsa and various weapons and are adorned with royal paraphernalia such as flags, ornamental umbrellas and wings.
तात्पर्य
भगवान् के विष्णु के भव्य अवतारों की शाही सामग्री उनकी सर्वशक्तिमानता को दर्शाती है, और भक्त भगवान के शक्तिशाली, शाही रूपों का ध्यान करके अजेय बन जाते हैं। जैसा कि कृष्ण-करनामृत, श्लोक 107 में बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा कहा गया है:

भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदी स्याद्

दैवेन नः फलति दिव्य-किशोर-मूर्तिः

मुक्तिः स्वयं मुकुलितांजलिः सेवतेऽस्मान्

धर्मार्थकामगतिायः समयप्रतीक्षाः

"हे मेरे प्रभु, यदि हम आपके प्रति अडिग भक्ति सेवा विकसित करते हैं, तो स्वचालित रूप से आपका दिव्य, युवा रूप हमारे सामने प्रकट होता है। इस प्रकार मुक्ति स्वयं हाथ जोड़े हमारी सेवा करने के लिए प्रतीक्षा करती है, और धार्मिकता, आर्थिक विकास और संवेदी संतुष्टि के अंतिम लक्ष्य धैर्यपूर्वक हमारी सेवा करने के लिए प्रतीक्षा करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)