यदा मन उपादाय यद् यद् रूपं बुभूषति ।
तत्तद् भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रय: ॥ २२ ॥
अनुवाद
जब कोई योगी किसी विशेष विधि से अपने मन को लगाकर कोई विशिष्ट रूप ग्रहण करना चाहता है, तो वही रूप तुरन्त प्रकट होता है। ऐसी सिद्धि मेरी उस अचिन्त्य योगशक्ति के आश्रय में मन को लीन करने से सम्भव है, जिसके द्वारा मैं असंख्य रूप धारण करता हूँ।
When a yogi wishes to assume a particular form by concentrating his mind on a particular method, that form appears instantly. Such siddhi is possible by immersing the mind in the shelter of my inconceivable yogic power, by which I assume innumerable forms.
तात्पर्य
इस सिद्धि को कामरूप कहते हैं अथवा किसी भी इच्छित रूप को धारण कर लेने की क्षमता। भगवान कृष्ण की सेवा के एक विशेष प्रकार में शुद्ध भक्त अपना मन लगाते हैं और इस तरह धीरे-धीरे आनंद और ज्ञान के शाश्वत जीवन के लिए एक आध्यात्मिक शरीर ग्रहण करते हैं। इस प्रकार कोई भी जो कृष्ण के पवित्र नामों का जाप करने की प्रक्रिया अपनाता है और मानव जीवन के विनियामक सिद्धांतों का पालन करता है, वह कामरूप की परम सिद्धि प्राप्त कर सकता है, जो भगवान के राज्य में एक शाश्वत, आध्यात्मिक शरीर ग्रहण करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥