त्रिभिर्गुण-मयैर्भावैर्
एभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति
मामेभ्यः परमव्ययम्
"त्रिगुण [सात्विक, रजो और तमो] के भ्रम से समस्त ब्रह्मांड आप मुझे नहीं जानता, जो इन गुणों से परे और अक्षय हूँ।" इसलिए प्रभु को तुरीय या प्रकृति के तीन गुणों से परे चौथा कारक कहा जाता है। श्रील वीरराघव आचार्य के अनुसार, तुरीय यह भी इंगित करता है कि प्रभु चेतना के तीन साधारण चरणों, अर्थात् जागरण, स्वप्न और सुषुप्ति के परे हैं। भगवत्-छब्द-शब्दित बताता है कि भगवान को भगवान के रूप में जाना जाता है, या असीमित ऐश्वर्य के धारक, विशेषकर रूप, यश, संपत्ति, ज्ञान, त्याग और बुद्धि।
सारांश में, प्रभु को तुरीय के रूप में ध्यान करके, जो इन गुणों से परे चौथा कारक है, व्यक्ति रहस्यवादी वैभव वशीता, या प्रकृति के गुणों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। सब कुछ ईश्वर के कृपा पर निर्भर करता है।
