श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  11.15.16 
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते ।
मनो मय्यादधद् योगी मद्धर्मा वशितामियात् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
वह योगी जो अपने चित्त को मेरे नारायण रूप में लगाता है, जिसे सभी ऐश्वर्यों से पूर्ण चौथी अवस्था (तुरीय) माना जाता है, वह मेरे स्वभाव से युक्त हो जाता है और उसे वशिता नामक योग-सिद्धि प्राप्त होती है।
 
The Yogi who fixes his mind on My form of Narayana, which is considered to be the fourth state (Turiya) full of all splendors, becomes one with My nature and attains the yogic perfection called Vashita.
तात्पर्य
भगवद्गीता (7.13) में भगवान कृष्ण कहते हैं:

त्रिभिर्गुण-मयैर्भावैर्

एभिः सर्वमिदं जगत्

मोहितं नाभिजानाति

मामेभ्यः परमव्ययम्

"त्रिगुण [सात्विक, रजो और तमो] के भ्रम से समस्त ब्रह्मांड आप मुझे नहीं जानता, जो इन गुणों से परे और अक्षय हूँ।" इसलिए प्रभु को तुरीय या प्रकृति के तीन गुणों से परे चौथा कारक कहा जाता है। श्रील वीरराघव आचार्य के अनुसार, तुरीय यह भी इंगित करता है कि प्रभु चेतना के तीन साधारण चरणों, अर्थात् जागरण, स्वप्न और सुषुप्ति के परे हैं। भगवत्-छब्द-शब्दित बताता है कि भगवान को भगवान के रूप में जाना जाता है, या असीमित ऐश्वर्य के धारक, विशेषकर रूप, यश, संपत्ति, ज्ञान, त्याग और बुद्धि।

सारांश में, प्रभु को तुरीय के रूप में ध्यान करके, जो इन गुणों से परे चौथा कारक है, व्यक्ति रहस्यवादी वैभव वशीता, या प्रकृति के गुणों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। सब कुछ ईश्वर के कृपा पर निर्भर करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)