श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 13: हंसावतार द्वारा ब्रह्मा-पुत्रों के प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.13.8 
श्रीउद्धव उवाच
विदन्ति मर्त्या: प्रायेण विषयान् पदमापदाम् ।
तथापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
श्री उद्धव ने कहा : हे कृष्ण, सामान्यतः मनुष्य यह समझते हैं कि भौतिक जीवन भविष्य में बहुत दुःख देता है, फिर भी, वे भौतिक जीवन का भोग करना चाहते हैं। हे प्रभु, यह जानते हुए भी, वे कुत्ता, गधा या बकरी की भाँति आचरण कैसे करते हैं।
 
Sri Uddhava said: O Krishna, generally men know that material life brings great suffering in the future, yet they still want to enjoy material life. O Lord, even after knowing this, how they worship like a dog, a donkey or a goat.
तात्पर्य
भौतिक जगत में भोग विलास के प्रमुख साधन हैं - मैथुन, धन और झूठी प्रतिष्ठा। इन सबको अत्यधिक कष्ट सहकर प्राप्त किया जाता है और अंततः इन्हें खोना पड़ता है। भौतिक जीवन में लिप्त व्यक्ति वर्तमान में कष्ट उठाता है तथा जन्म-मरण के चक्र में आगे चलकर उसे केवल अंधकारमय भविष्य की ही प्राप्ति होगी। जो मनुष्य इन सब बातों को जानकर भी कुत्तों, गधों और बकरियों की तरह भोग विलास में डूबे रहते हैं उनका जीवन कैसे सार्थक हो सकता है? अक्सर एक कुत्ता एक कुतिया के पास मैथुन के लिए जाता है लेकिन संभव है कि वह कुतिया उसकी ओर आकर्षित न हो और अपने दाँत दिखाकर, गुर्राकर या उसे काटकर दूर भगा देती हो। इसके बावजूद वह कुत्ता उसके पीछे घूमता फिरता है और थोड़े से भोगसुख की प्राप्ति का प्रयास करता है। इसी प्रकार अक्सर यह भी होता है कि एक कुत्ता उस जगह से भोजन चुराते वक्त मारा-पीटा या गोली मारा जा सकता है जहाँ उसे जाना ही नहीं चाहिए। गधा गधी की ओर बहुत आकर्षित होता है लेकिन वह गधी अक्सर उसे लात मारती है। इसी प्रकार गधे का मालिक उसे एक मुट्ठी घास देता है जिसे वह गधा अपने आप कहीं से भी ला सकता है, फिर उस पर बहुत सारा बोझ लाद देता है। बकरा आमतौर पर कत्ल करने के लिए पाला जाता है और जब वह कत्लखाने में होता है फिर भी वह बिना किसी शर्म के मैथुनसुख प्राप्त करने के लिए बकरी के पीछे जाता है। इस प्रकार जानवर स्वयं को गोली लगने, काटे जाने, पीटे जाने और काटे जाने के जोखिम में डालकर भी अपने मूर्खतापूर्ण भोगविलास में लगे रहते हैं। एक शिक्षित मनुष्य स्वयं को ऐसे निंदनीय जीवन की ओर कैसे प्रेरित कर सकता है जिसका परिणाम जानवरों के जीवन के परिणामों के समान ही होता है? अगर सद्गुण के मार्ग को अपनाकर कोई जीवन को सुख, आत्मज्ञान और भावी पुरस्कारों से भर देता है तो कोई क्यों रजोगुण और तमोगुण के मार्ग को अपनाएगा? यह उद्धवजी का प्रश्न है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)