श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 13: हंसावतार द्वारा ब्रह्मा-पुत्रों के प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  11.13.36 
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् ।
दैवादपेतमथ दैववशादुपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे कोई नशा करने वाला व्यक्ति यह नहीं देख पाता कि उसने कोट पहना है या शर्ट, उसी प्रकार जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार में पूर्ण है और जिसने अपना शाश्वत स्वरूप प्राप्त कर लिया है, वह यह नहीं देखता कि नश्वर शरीर बैठा हुआ है या खड़ा है। हाँ, अगर ईश्वर की इच्छा से उसका शरीर समाप्त हो जाए या ईश्वर की इच्छा से उसे नया शरीर प्राप्त हो जाए, तो आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति उस पर ध्यान नहीं देता, जैसे एक शराबी अपनी बाहरी पोशाक की स्थिति पर ध्यान नहीं देता।
 
Just as a person who has drunk alcohol cannot see whether he is wearing a coat or a shirt, similarly a person who is fully self-realized and has attained his eternal form does not see whether the mortal body is sitting or standing. Yes, if by the will of God his body perishes or he gets a new body, then the self-realized person does not see it in the same way as a drunkard does not see his outer attire.
तात्पर्य
कृष्ण भावनाभिभूत जीव, जो अपनी आध्यात्मिक पहचान प्राप्त कर चुका है, भौतिक संसार में इंद्रिय तृप्ति को अपने जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं करता है। वह निरंतर भगवान की सेवा में संलग्न रहता है और जानता है कि यह अस्थायी शरीर और चंचल मन भौतिक हैं। कृष्ण चेतना में श्रेष्ठ बुद्धि से वह भगवान की सेवा में लगा रहता है। इस श्लोक में शराबी व्यक्ति का उदाहरण बहुत ही सुंदर है। यह सर्वविदित है कि सांसारिक सामाजिक समारोहों में लोग नशे में धुत हो जाते हैं और अपनी बाहरी स्थिति के बारे में पूरी तरह से जागरूकता खो देते हैं। इसी तरह, एक मुक्त आत्मा ने पहले ही अपने आध्यात्मिक शरीर को प्राप्त कर लिया है और इसलिए जानता है कि उसका निरंतर अस्तित्व भौतिक शरीर पर निर्भर नहीं करता है। हालाँकि, एक मुक्त आत्मा शरीर को दंड नहीं देती है बल्कि तटस्थ रहती है, स्वाभाविक रूप से परम की इच्छा के रूप में अपने भाग्य को स्वीकार करती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)