श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 13: हंसावतार द्वारा ब्रह्मा-पुत्रों के प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.13.33 
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था
मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्था: ।
सञ्छिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण-
ज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें विचार करने की जरूरत है कि कैसे मेरी मायाशक्ति के प्रभाव में, ये तीन मानसिक स्थितियाँ, प्रकृति के गुणों से जुड़ी हुई हैं, उनसे प्रभावित हैं और कृत्रिम रूप से मुझमें विद्यमान मानी जाती हैं। आत्मा के सत्य होने को सुनिश्चित करने के बाद, तर्क, मुनियों और वेदों से मिले ज्ञान से प्राप्त तेज तलवार से ये तीन स्थितियाँ और झूठा अहंकार काट दो, जो सभी शंकाओं का जन्मदाता है। इसके बाद तुम सबको अपने हृदय में स्थित मुझ परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए।
 
You should consider how these three states of mind, produced by the modes of nature, are artificially assumed to exist in Me by the influence of My illusory potency. Having ascertained the reality of the Self, you should completely cut off false pride with the sharp sword of knowledge, obtained by reasoning and the injunctions of the sages and the Vedic scriptures, for it is the fosterer of all doubts. Then you should all worship Me, situated in your hearts.
तात्पर्य
जो कोई सांसारिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह इस प्रकार के तीन चरणों में विभाजित सामान्‍य चेतना पर निर्भर नहीं रह जाता, जिसमें जाग्रति, स्‍वप्‍न और स्‍वप्नरहित नींद आते हैं। वह व्यक्ति अपने भौतिक मन को प्रभु की ताकत के कम ऊर्जा की ओर आनंद लेने की ओर झुकाव को दूर करता है, और हर चीज को प्रभु की शक्ति का हिस्‍सा समझता है, जो केवल प्रभु के उपयोग के लिए ही है। चेतना की इस अवस्‍था में, वह प्रभु की भक्‍ति सेवा के लिए पूरी तरह से समर्पित हो जाता है, और यहाँ प्रभु हंस प्रभु ब्रह्मा के पुत्रों को इसे अपनाने की सलाह देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)