जाग्रत् स्वप्न: सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तय: ।
तासां विलक्षणो जीव: साक्षित्वेन विनिश्चित: ॥ २७ ॥
अनुवाद
जागना, सोना और गहरी नींद - बुद्धि के ये तीन कार्य प्रकृति के गुणों द्वारा उत्पन्न होते हैं। शरीर के अंदर रहने वाली आत्मा इन तीनों अवस्थाओं से अलग लक्षणों द्वारा पहचानी जाती है, इसीलिए वह इनकी साक्षी बनी रहती है।
Waking, sleeping and deep sleep—these are the three functions of the intellect and are produced by the modes of nature. The living entity within the body is determined by the characteristics different from these three states, and hence he remains a witness to them.
तात्पर्य
आत्मा का वास्तव में भौतिक संसार से कोई लेना-देना नहीं है, उसका भौतिक संसार से कोई स्थायी या स्वाभाविक रिश्ता नहीं है। वास्तविक त्याग का अर्थ है पदार्थ के सूक्ष्म और स्थूल रूपों से भ्रामक पहचान को त्याग देना। सुषुप्ति यानी गहरी नींद, जिसमें बिना किसी सपने या सचेत गतिविधि के सोते हैं। इन तीन अवस्थाओं का वर्णन भगवान कृष्ण ने इस प्रकार किया है:
“एक को यह जानना चाहिए कि जागरण सत्व से पैदा होता है, सपना रजस से आदेशित होता है, और अत्यधिक निद्रा अज्ञानता से पैदा होती है। चौथा तत्व, शुद्ध चेतना इन तीनों से अलग है और उनमें व्याप्त है।” (भाग. 11.25.20) वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है साक्षीपन, या माया के कार्यों के साक्षी के रूप में अस्तित्व। कृष्ण चेतना के विकास से ऐसी लाभकारी स्थिति प्राप्त की जाती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)