श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 13: हंसावतार द्वारा ब्रह्मा-पुत्रों के प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.13.23 
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुत: ।
को भवानिति व: प्रश्न‍ो वाचारम्भो ह्यनर्थक: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
यदि तुम लोग मुझसे यह प्रश्न पूछ रहे हो कि, “आप कौन हैं?” और तुम लोग भौतिक शरीर की बात कर रहे हो, तो मैं यह कहना चाहूँगा कि सारे भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश नामक पाँच तत्वों से मिलकर बने हैं। इसलिए, तुम लोगों को ऐसे पूछना चाहिए था, “आप पाँच कौन हैं?” यदि तुम लोग मानते हो कि सारे भौतिक शरीर एक जैसे तत्वों से बने हुए हैं और अंत में एक ही हैं, तो भी तुम्हारा प्रश्न अर्थहीन है क्योंकि एक शरीर को दूसरे शरीर से अलग करने में कोई गंभीर उद्देश्य नहीं है। इस प्रकार, ऐसा लगता है कि मेरी पहचान पूछ कर, तुम लोग ऐसे शब्द बोल रहे हो जिनका कोई वास्तविक अर्थ या उद्देश्य नहीं है।
 
If you mean to speak of the physical body by asking me, “Who are you?” I would like to point out that all physical bodies are composed of five elements—earth, water, fire, air, and space. Therefore, you should have asked, “Who are you five?” If you believe that all physical bodies are ultimately one because they are composed of the same elements, then your question is still meaningless because there is no serious purpose in distinguishing one body from another. Thus, by asking about my identity, you seem to be speaking words that have no real meaning or purpose.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार की है। "पिछले श्लोक में भगवान कृष्ण ने प्रदर्शित किया कि यदि ऋषि उस अवैयक्तिक दर्शन को स्वीकार कर लेते जिसके अंतर्गत सभी जीव सभी प्रकार से एक समान होते हैं, तो उनका प्रश्न 'तुम कौन हो?' निरर्थक होगा, क्योंकि आत्मा के एक रूप को दूसरे से अलग करने के लिए कोई दार्शनिक आधार नहीं होगा। इस श्लोक में भगवान पंच तत्वों से बने भौतिक शरीर के साथ झूठे तादात्म्य का खंडन करते हैं। यदि ऋषि शरीर को आत्म मान लेते, तो उनका प्रश्न निरर्थक होता, क्योंकि उन्हें पूछना पड़ता, 'तुम पाँच कौन हो?' यदि ऋषियों ने उत्तर दिया कि यद्यपि शरीर मूल रूप से पंच तत्वों से बना है और इन तत्वों को संपूर्ण शरीर के रूप में एक ही पदार्थ माना जा सकता है, तो भगवान पहले ही समानेषु च वस्तुत: शब्दों द्वारा उत्तर दे चुके हैं। मनुष्यों, देवताओं, पशुओं आदि के शरीर सभी समान पंच तत्वों से बने हैं और अनिवार्य रूप से समान हैं। इसलिए, 'तुम कौन हो?' प्रश्न अंततः निरर्थक है। इस प्रकार, यदि कोई या तो इस सिद्धांत को स्वीकार करता है कि सभी जीव अंततः समान हैं या यह सिद्धांत कि सभी जीव अंततः अपने भौतिक शरीर से भिन्न नहीं हैं, दोनों ही मामलों में ऋषियों का प्रश्न निरर्थक है। "ऋषि तर्क दे सकते हैं कि विद्वानों के बीच भी कई विषयों पर प्रश्न पूछना और उत्तर देना सामान्य जीवन का एक हिस्सा है। ऋषि बता सकते हैं कि भगवान कृष्ण ने भी उनके बीच विप्राः, 'हे ब्राह्मणों' और वः, या 'तुम्हारा [प्रश्न]', जैसा कि इस श्लोक में व्यक्त किया गया है, कहकर भेद किया। इस तरह यह देखा जाता है कि भगवान भी प्रश्नों और उत्तरों के सामान्य रीति-रिवाजों को स्वीकार करते हैं। इस तर्क का उत्तर देने के लिए, भगवान कृष्ण कहते हैं, वाचारंभो हय अनर्थकः। प्रभु कहते हैं, 'यदि हम अंततः भिन्न नहीं हैं तो मैं आपको ब्राह्मणों के रूप में संबोधित करना केवल शब्दों का प्रदर्शन है। मैंने केवल आपके मेरे प्रति दृष्टिकोण का प्रतिदान किया। इसलिए, यदि हम अंततः एक हैं, तो न तो मेरे कथन का और न ही आपके प्रश्न का कोई वास्तविक अर्थ है। इसलिए मैं आपके प्रश्न से यह निष्कर्ष निकाल सकता हूं कि आप सभी वास्तव में बहुत बुद्धिमान नहीं हैं। इसलिए, आप परम ज्ञान की खोज क्यों कर रहे हैं? क्या आप सभी शर्मिंदा नहीं हैं?" श्रील माधवाचार्य इस संबंध में बताते हैं कि ऋषियों का प्रश्न उचित नहीं था, क्योंकि वे पहले ही अपने पिता, भगवान ब्रह्मा को भगवान हंस के चरण कमलों की पूजा करते हुए देख चुके थे। चूंकि उनका आध्यात्मिक गुरु और पिता भगवान हंस की पूजा कर रहे थे, इसलिए उन्हें तुरंत भगवान की स्थिति समझ लेनी चाहिए थी और उनका प्रश्न इस प्रकार निरर्थक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)