श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 13: हंसावतार द्वारा ब्रह्मा-पुत्रों के प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  11.13.14 
एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यै: सनकादिभि: ।
सर्वतो मन आकृष्य मय्यद्धावेश्यते यथा ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
सनक कुमार आदि मेरे भक्तों ने जो वास्तविक योग-पद्धति सिखाई है, वह इतनी ही है कि मनुष्य को चाहिए कि वह मन को अन्य सारी वस्तुओं से हटाकर सीधे और उचित ढंग से उसे मुझ में लीन कर दे।
 
The real method of Yoga as taught by My devotees like Sanaka Kumara etc. is simply this: withdrawing the mind from all other objects, one should directly and appropriately absorb it into Me.
तात्पर्य
यथा ("तदनुसार" या "ठीक से") शब्द यह इंगित करता है कि उद्धव की तरह भगवान कृष्ण या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि से सीधे सुनना चाहिए और सीधे (अद्धा) भगवान कृष्ण में मन लगाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)