निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान् ।
अन्त:प्रविष्ट आधत्त एवं देहगुणान् पर: ॥ ९ ॥
अनुवाद
ईंधन की स्थिति के अनुसार, जैसे अग्नि सुप्त, प्रकट, क्षीण और तेज जैसे विभिन्न रूपों में दिखाई दे सकती है, ठीक उसी प्रकार आत्मा भी भौतिक शरीर में प्रविष्ट होती है और शरीर के विशिष्ट लक्षणों को स्वीकार करती है।
Just as fire can take on various forms, such as dormant, active, feeble, and intense, depending on the condition of the fuel, the soul enters the physical body and assumes the specific characteristics of the body.
तात्पर्य
हालाँकि आग किसी खास वस्तु के अंदर प्रकट या नष्ट हो सकती है, लेकिन अग्नि तत्व हमेशा विद्यमान रहता है। इसी तरह, चिरस्थायी आत्मा एक योग्य शरीर में प्रकट होती है और फिर उस शरीर से गायब हो जाती है, लेकिन आत्मा हमेशा मौजूद रहती है। जिस तरह से आग अपने ईंधन से भिन्न होती है, वैसे ही आत्मा शरीर से भिन्न होती है। एक माचिस एक छोटी सी आग पैदा करती है, जबकि एक विशाल पेट्रोल टैंक का विस्फोट आकाश में ऊंची लपटों को उड़ा देगा। लेकिन फिर भी, आग एक ही होती है। इसी तरह, एक आध्यात्मिक आत्मा ब्रह्मा के शरीर में प्रकट हो सकती है और दूसरी एक चींटी के शरीर में, लेकिन आध्यात्मिक आत्मा गुणात्मक रूप से हर शरीर में एक जैसी ही होती है। अज्ञानता के कारण हम आत्मा पर शारीरिक विशेषताओं को थोप देते हैं, और इस प्रकार हम कहते हैं कि एक विशेष व्यक्ति अमेरिकी, रूसी, चीनी, अफ़्रीकी या मैक्सिकन है या कि वह बूढ़ा है या जवान। यद्यपि ऐसे पदनाम निश्चित रूप से शरीर पर लागू होते हैं, वे आध्यात्मिक आत्मा पर लागू नहीं होते हैं, जिसे यहाँ पराह, या एक आध्यात्मिक इकाई के रूप में वर्णित किया गया है। जब तक भ्रमित आध्यात्मिक आत्मा भगवान के प्रति विरोधी भाव रखती है, तब तक स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के पदनाम उसके चारों ओर ही रहेंगे, उसे अंधेरे में ही रखेंगे। यदि कोई बौद्धिक रूप से खुद को जीवन के विभिन्न भौतिकवादी दर्शनों के साथ पहचानता है, तो वह सूक्ष्म मन से ढँक जाता है। अंततः जो कुछ भी मौजूद है वह परम सत्य, भगवान कृष्ण का अभिन्न अंग है। जब जीव इस बात को समझ जाता है, तो वह निरुपाधि, या भौतिक पदनामों से मुक्त हो जाता है। यही उसकी संवैधानिक स्थिति है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥