यह सवाल उठ सकता है कि व्यक्ति झूठे स्वामित्व से मुक्ति कैसे विकसित कर सकता है। श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने निम्नलिखित उदाहरण दिया है। एक साधारण व्यक्ति अधिक से अधिक धन संचय करने के लिए बहुत उत्सुक होता है, और वह बैंक खातों, संपत्तियों, सोने आदि के रूप में अपनी संपत्ति बनाए रखता है। जब तक ये विभिन्न संपत्तियां उसकी वित्तीय भलाई में योगदान दे रही हैं, तब तक वह उन्हें समान रूप से देखता है और उन्हें अपना मानता है। लेकिन अगर उसकी कुछ संपत्तियां सरकार द्वारा करों के लिए ले ली जाती हैं, या अगर वे एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यापारिक व्यवस्था में खो जाती हैं, तो उसे अपने स्वामित्व की भावना छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उसी तरह, हर किसी को इतना बुद्धिमान होना चाहिए कि वह यह समझ सके कि असंख्य भौतिक वस्तुओं पर उसका स्वामित्व की भावना स्थायी नहीं है; इसलिए इन चीजों से वैराग्य विकसित करना चाहिए। अगर कोई भगवान के व्यक्तित्व और उसके शुद्ध भक्त, आध्यात्मिक गुरु के लिए प्रेमपूर्ण मैत्री नहीं करता, तो वह निस्संदेह भौतिक समाज, दोस्ती और प्यार के जाल में फंसा रहेगा। तब वह स्थायी खुशी की कोई उम्मीद के बिना भौतिक मंच पर बंधा रहेगा।
