श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  11.10.7 
जायापत्यगृहक्षेत्रस्वजनद्रविणादिषु ।
उदासीन: समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मन: ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को हर परिस्थिति में जीवन के असली स्वार्थ (उद्देश्य) को समझना चाहिए और इसलिए पत्नी, बच्चों, घर, जमीन, रिश्तेदारों, दोस्तों, धन इत्यादि से अलग रहना चाहिए।
 
A man must look at the real self-interest (purpose) of his life in all circumstances and hence should remain detached from wife, children, house, land, relatives, friends, property etc.
तात्पर्य
भगवान के भक्त को यह पता होता है कि उनकी पत्नी, बच्चे, घर, भूमि, दोस्त और धन सभी को परम भगवान की प्रेममय सेवा में लगाना चाहिए। इसलिए, वह अपने परिवार और दोस्तों के कामुक सुख के लिए हड़बड़ी में व्यवस्था नहीं करता। वह अपनी पत्नी का मालिक और बच्चों का भगवान होने के झूठे प्रतिष्ठा का आनंद लेने के लिए उत्सुक नहीं रहता, और न ही वह अपने दोस्तों और समाज से प्रतिष्ठा पाने के लिए चिंतित रहता है| इस तरह वो किसी से ईर्ष्या नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के मामले में आलसी नहीं होता। वह स्वामित्व की झूठी भावना से मुक्त है और भगवान के व्यक्तित्व के बारे में अपनी समझ विकसित करने के लिए हमेशा उत्सुक रहता है। वह झूठे अहंकार से मुक्त है और स्वचालित रूप से बेकार भौतिकवादी बातचीत से दूर भागता है। इस प्रकार वह स्थिर है न कि सनकी, और वह हमेशा आध्यात्मिक गुरु के चरण कमलों में प्रेमपूर्ण मित्रता में दृढ़ता से स्थित है।

यह सवाल उठ सकता है कि व्यक्ति झूठे स्वामित्व से मुक्ति कैसे विकसित कर सकता है। श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने निम्नलिखित उदाहरण दिया है। एक साधारण व्यक्ति अधिक से अधिक धन संचय करने के लिए बहुत उत्सुक होता है, और वह बैंक खातों, संपत्तियों, सोने आदि के रूप में अपनी संपत्ति बनाए रखता है। जब तक ये विभिन्न संपत्तियां उसकी वित्तीय भलाई में योगदान दे रही हैं, तब तक वह उन्हें समान रूप से देखता है और उन्हें अपना मानता है। लेकिन अगर उसकी कुछ संपत्तियां सरकार द्वारा करों के लिए ले ली जाती हैं, या अगर वे एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यापारिक व्यवस्था में खो जाती हैं, तो उसे अपने स्वामित्व की भावना छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उसी तरह, हर किसी को इतना बुद्धिमान होना चाहिए कि वह यह समझ सके कि असंख्य भौतिक वस्तुओं पर उसका स्वामित्व की भावना स्थायी नहीं है; इसलिए इन चीजों से वैराग्य विकसित करना चाहिए। अगर कोई भगवान के व्यक्तित्व और उसके शुद्ध भक्त, आध्यात्मिक गुरु के लिए प्रेमपूर्ण मैत्री नहीं करता, तो वह निस्संदेह भौतिक समाज, दोस्ती और प्यार के जाल में फंसा रहेगा। तब वह स्थायी खुशी की कोई उम्मीद के बिना भौतिक मंच पर बंधा रहेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)