श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.10.4 
निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत् ।
जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनाम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जिसने अपने जीवन-लक्ष्य के रूप में मुझे अपने मन में बिठा लिया है, उसे इन्द्रियों के भोग पर आधारित कर्म त्याग देने चाहिए और उन्नति के लिए विधि-विधानों द्वारा अनुशासित कर्म करना चाहिए। किन्तु जब कोई व्यक्ति आत्मा के चरम सत्य की खोज में पूरी तरह लगा हो, तो उसे सकाम कर्मों को नियंत्रित करने वाले शास्त्रीय आदेशों को भी स्वीकार नहीं करना चाहिए।
 
One who has fixed Me in his mind as his life-goal should abandon actions based on sense-gratification and perform actions disciplined by rules and regulations for progress. But when a person is fully engaged in the search for the ultimate truth of the soul, he should not even follow the scriptural injunctions that control fruitive actions.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि जिज्ञासायं सम्प्रवृत्तः शब्द उस व्यक्ति का उल्लेख करते हैं जो योग-आरुढ़ है, या योग प्रक्रिया में उन्नत है। भगवद्-गीता (6.3-4) में कहा गया है:

आरुक्षोरुर्नर योगं

कर्म कारणमुच्यते

योगारूढ़स्य तस्यैव

शमः कारणमुच्यते

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु

न कर्मस्वनुषज्जते

सर्व-संकल्प-सन्न्यासी

योगारूढ़स्तदुच्यते

"जो व्यक्ति अष्टांग योग प्रणाली में नौसिखिया है, उसके लिए काम करना साधन माना जाता है; और जो व्यक्ति पहले से ही योग को प्राप्त कर चुका है, उसके लिए सभी भौतिक गतिविधियों का त्याग करने को साधन माना जाता है। एक व्यक्ति को योग प्राप्त कर लेने के लिए कहा जाता है, जब वह सभी भौतिक इच्छाओं का त्याग करने के बाद, न तो इंद्रिय तृप्ति के लिए कार्य करता है और न ही कामसूत्र संबंधी गतिविधियों में शामिल होता है।" उदाहरण दिया जा सकता है कि एक साधारण व्यक्ति भौतिक इंद्रिय सुख के लिए महिलाओं की संगति का आनंद लेने की कोशिश करेगा। इसे प्रवृत्त-कर्म या इंद्रिय तृप्ति का मार्ग कहा जाता है। एक धार्मिक व्यक्ति भी एक महिला की संगति का आनंद लेगा, लेकिन वर्णाश्रम प्रणाली के विनियमन सिद्धांतों के तहत। हालांकि, जो व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति में पूरी तरह से तल्लीन है, वह अंततः यौन संबंध से प्राप्त होने वाले सभी इंद्रिय तृप्ति को छोड़ देगा, चाहे वह विनियमित हो या अवैध। इसी तरह, प्रवृत्त-कर्म की अवस्था में, या साधारण इंद्रिय तुष्टीकरण में, व्यक्ति अपनी जीभ को जो भी पसंद करता है वह खा जाएगा। दूसरी ओर, एक भौतिकवादी भक्त कभी-कभी भव्य व्यंजन बनाएगा और उन्हें भगवान को अर्पित करेगा, भगवान को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जीभ और पेट को संतुष्ट करने के इरादे से। हालाँकि, जो व्यक्ति सम्प्रवृत्त है या आध्यात्मिक चेतना में पूरी तरह से लिप्त है, वह केवल अपनी जीभ को संतुष्ट करने में कभी दिलचस्पी नहीं रखता है। वह भौतिकवादी व्यक्तियों द्वारा तैयार किए गए सामान्य खाद्य पदार्थों से परहेज करता है, और सिर्फ कृष्ण की सेवा के लिए अपने शरीर को फिट रखने के उद्देश्य से, वह मध्यम मात्रा में भोजन करता है जिसे पहले भगवान को भगवान की खुशी के लिए अर्पित किया गया है।

आध्यात्मिक साक्षात्कार की प्रक्रिया धीरे-धीरे एक बद्ध आत्मा को भौतिकवादी चेतना के निम्नतम बिंदु से भगवान के व्यक्तित्व के प्रति प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से निमग्न कर देती है। शुरुआत में सिखाया जाता है कि अपने आनंद देने वाले स्वभाव को पहले अपने काम के फल को भगवान को अर्पित करके जोड़ना चाहिए। हालाँकि, उन्नत अवस्था में, कामसूत्र संबंधी गतिविधियों (कर्म-कोडनम्) को निष्पादित करने की इच्छा अनुपस्थित होती है, और व्यक्ति बिना किसी स्वार्थी उद्देश्य के बस भगवान की प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है। उदाहरण के लिए, कृष्ण चेतना का प्रचार करने वाला एक त्यागी संन्यासी, या यहाँ तक कि कृष्ण चेतना का प्रचार करने वाला एक त्यागी गृहस्थ, को पारिवारिक जीवन में इंद्रिय तृप्ति को नियंत्रित करने वाले सभी आदेशों को निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं है। अंततः, हर इंसान को कृष्ण चेतना के पारलौकिक कर्तव्यों को अपनाना चाहिए। किसी की अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए काम करने और फिर परिणामों को कृष्ण को अर्पित करने के बजाय, व्यक्ति को सीधे उनकी अपनी अंतरंग इच्छाओं के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने में पूरी तरह से संलग्न होना चाहिए।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती थाकुर के अनुसार, भौतिक दुनिया का आनंद लेने का कोई भी प्रयास, चाहे वह धार्मिक हो या अधार्मिक, अंततः अंतर्विरोधों से भरा होगा। व्यक्ति को इच्छाहीनता, भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम के मंच पर आना चाहिए और इस प्रकार जीवन की सभी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)