श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  11.10.36-37 
कथं वर्तेत विहरेत् कैर्वा ज्ञायेत लक्षणै: ।
किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा ॥ ३६ ॥
एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्न‍ं प्रश्न‍‌विदां वर ।
नित्यबद्धो नित्यमुक्त एक एवेति मे भ्रम: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
हे अच्युत भगवन, एक ही जीव को कभी नित्य बद्ध कहा जाता है, और कभी नित्य मुक्त। इसलिए जीव की वास्तविक स्थिति मेरी समझ से परे है। हे प्रभु, आप दार्शनिक प्रश्नों का उत्तर देने में सर्वश्रेष्ठ हैं। कृपया मुझे वे लक्षण समझाएँ, जिनसे नित्य बद्ध और नित्य मुक्त जीव में अंतर बताया जा सके। वे किन विभिन्न तरीकों से स्थिति रखते हैं, जीवन का आनंद लेते हैं, खाते हैं, मल त्याग करते हैं, लेटते हैं, बैठते हैं या इधर-उधर जाते हैं?
 
O Infallible Lord, the same soul is sometimes called eternally bound and sometimes eternally liberated. Therefore I am unable to understand the real state of the soul. O Lord, you are the best in answering philosophical questions. Kindly explain to me the characteristics by which it can be told what is the difference between the eternally bound and the eternally liberated soul. By what methods do they remain situated, enjoy life, eat, excrete, lie down, sit or move about?
तात्पर्य
पिछले श्लोकों में भगवान कृष्ण ने उद्धव को समझाया है कि सदा के लिए मुक्त आत्मा भौतिक प्रकृति की तीनों रीतियों से परे है। चूंकि मुक्त आत्मा को सद्गुण के श्रेष्ठतम तरीके से भी परे माना जाता है, इसलिए उसे कैसे पहचाना जा सकता है? प्रकृति के तरीकों से झूठी पहचान के द्वारा, जो अपने भौतिक शरीर का निर्माण करते हैं, व्यक्ति भ्रम से बंध जाता है। दूसरी ओर, प्रकृति के तरीकों से पार होकर, व्यक्ति मुक्त हो जाता है। हालाँकि, सामान्य गतिविधियों में - जैसे खाना, शौच करना, विश्राम करना, बैठना और सोना - एक मुक्त आत्मा और एक वातानुकूलित आत्मा एक ही तरह की दिखाई देती है। इसलिए उद्धव पूछताछ कर रहा है, "मैं किन लक्षणों से पहचान सकता हूँ कि एक जीवित इकाई झूठे अहंकार के बिना ऐसी बाहरी गतिविधियों का प्रदर्शन कर रही है, और किन लक्षणों से मैं पहचान सकता हूँ कि कोई भौतिक पहचान की भ्रामक बंधन के तहत काम कर रहा है? यह मुश्किल है, क्योंकि मुक्त और वातानुकूलित व्यक्तित्वों के सामान्य शारीरिक कार्य समान दिखाई देते हैं।" उद्धव ने भगवान श्री हरि को, उन्हें अपना व्यक्तिगत आध्यात्मिक गुरु मानते हुए, संपर्क किया है और वे यह समझना चाहते हैं कि भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच के अंतर को कैसे समझा जाए। चूंकि जीवित इकाई को कभी-कभी सदा के लिए वातानुकूलित कहा जाता है, इसलिए उसे सदा के लिए मुक्त, या इसके विपरीत कैसे माना जा सकता है? यह एक स्पष्ट विरोधाभास है, जिसे भगवान श्री हरि द्वारा साफ़ किया जाएगा।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत दसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)