काल आत्मागमो लोक: स्वभावो धर्म एव च ।
इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरे सति ॥ ३४ ॥
अनुवाद
जब प्रकृति के गुणों में हलचल और परस्पर क्रिया होती है, तो जीव मुझे सर्वशक्तिमान समय, स्वयं, वैदिक ज्ञान, ब्रह्मांड, स्वयं का स्वभाव, धार्मिक अनुष्ठान आदि विभिन्न तरीकों से वर्णित करते हैं।
When there is agitation and interaction among the modes of nature, the living beings describe Me in many ways such as Almighty Time, Soul, Vedic knowledge, Universe, One's own nature, religious festivals, etc.
तात्पर्य
ईश्वर की शक्ति का अनुभव व्यक्ति विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों का प्रकृति और गतिविधियों को धीरे-धीरे कैसे विकसित करते हैं, दृश्य देखकर कर सकता है-देव, मानव, जानवर, मछलियाँ, पक्षी, कीट, पेड़-पौधे, आदि। जीवन की प्रत्येक प्रजाति संतुष्टि के लिए एक विशेष प्रक्रिया का पालन करती है, और इस कार्य को प्रजाति का धर्म कहते हैं। ईश्वर के व्यक्तित्व का ज्ञान न होने के कारण, साधारण व्यक्ति ऊपर उल्लेखित अवतरण में भगवान की शक्तियों की झलक पाते हैं। श्रील माध्वाचार्य ने तंत्र- भागवत में से निम्नलिखित जानकारी उद्धृत की है। भगवान को काल, या समय, कहा जाता है, क्योंकि वे सभी भौतिक गुणों के प्रेरक और नियंत्रक हैं। चूंकि वे परिपूर्ण और पूरे हैं, उन्हें आत्मा, या स्वयं कहा जाता है, और वे सभी ज्ञान के प्रतीक हैं। स्वभाव शब्द इंगित करता है कि भगवान अपने भाग्य को पूरी तरह से नियंत्रित करते हैं, और हर किसी के पालनकर्ता के रूप में उन्हें धर्म कहा जाता है। मुक्ति मंच पर किसी व्यक्ति को भगवान के व्यक्तित्व की पूजा करके असीमित आनंद प्राप्त हो सकता है, जबकि जो लोग भगवान के बारे में नहीं जानते हैं, वे पूजा की अन्य वस्तुओं का आविष्कार करके खुशी खोजने की कोशिश करते हैं। यदि कोई हठपूर्वक कल्पना करता है कि भगवान से स्वतंत्र कुछ भी है, तो वह भगवान की शक्ति के भ्रामक जाल की चपेट में रहेगा। भौतिक चीजों के नष्ट होने की अनिवार्यता को देखकर, व्यक्ति लगातार भयभीत रहता है और अज्ञानता के अंधेरे में लगातार रोता रहता है। ऐसे अंधेरे में खुशी का कोई प्रश्न ही नहीं है। इसलिए, किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान के व्यक्तित्व से स्वतंत्र कुछ भी है। जैसे ही कोई कुछ भी भगवान से स्वतंत्र मानता है, तो वह तुरंत भगवान के भ्रामक नेटवर्क, माया नामक, की चपेट में आ जाता है। भगवान के व्यक्तित्व के लिए किसी को भी हमेशा विनम्र और आज्ञाकारी रहना चाहिए, भले ही व्यक्ति मुक्त हो, और इस प्रकार वह सर्वोच्च आध्यात्मिक सुख प्राप्त करेगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥