श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.10.33 
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम् ।
य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिता: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
प्रकृति के गुणों पर निर्भर रहने वाला बद्ध जीव सकाम कर्मों में लगा रहता है, और वह हमेशा मुझ भगवान से डरता रहता है क्योंकि कर्मों के फल उसके द्वारा भोगे जाते हैं। जो लोग भौतिकवादी जीवन को ही सच्चा मानकर प्रकृति के गुणों की विविधता को असली मानते हैं, वे भौतिक सुखों में लिप्त हो जाते हैं और हमेशा शोक और दुःख में डूबे रहते हैं।
 
The conditioned soul who is subject to the modes of nature and is dependent on fruitive activities fears Me, the Supreme Personality of Godhead, because I enforce the results of his fruitive activities. Those who accept the diversity of the modes of nature as reality and accept the concept of materialistic life engage themselves in material enjoyment and are always immersed in sorrow and misery.
तात्पर्य
जीव माया के जाल में फंसा हुआ है, किंतु यद्यपि वह समझ सकता है कि वह श्रेष्ठ शक्तियों पर निर्भर है फिर भी वह परमेश्वर की सेवा नहीं करना चाहता। इस प्रकार वह जीवन के भय से भर जाता है। भौतिक सुख-भोग की इच्छा में, जीव राक्षस कंस की भांति हमेशा अपने भौतिक प्रबंधन के नष्ट हो जाने से डरता रहता है। भौतिक प्रकृति के स्वादों के आदी रहते हुए, वह धीरे-धीरे जीवन के एक अतार्किक रूप में डूब जाता है।

माया में दो शक्तियां होती हैं - पहली जीव को ढकती है, और दूसरी उसे जीवन की नारकीय स्थिति में फेंक देती है। जब कोई माया से ढका होता है, तो वह विवेक की सारी शक्ति खो देता है, और माया ऐसे मूर्ख को अज्ञान के अंधकार में फेंक देती है। जब कोई स्वयं को गलत तरीके से भगवान कृष्ण, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व से स्वतंत्र मानता है, तो वह भौतिक भोग-विलास का आनंद लेने की आशा में अस्थायी भौतिक वस्तुओं का उपासक बन जाता है, और जैसे-जैसे वह बूढ़ा होता जाता है, उसका जीवन भय और चिंता से भर जाता है। एक सशर्त आत्मा स्वयं को अपने जीवन का नियंत्रण करने वाला मानती है, लेकिन चूंकि उसके पास कोई वास्तविक नियंत्रक शक्ति नहीं है, इसलिए उसकी स्थिति विरोधाभासी है और बिल्कुल भी सुखद नहीं है। जैसे ही उसके सभी भौतिक संपत्ति समय के साथ चली जाती है, वह विलाप से भर जाता है। कुल मिलाकर, भौतिक जीवन वास्तव में घृणित है, और यह केवल घने भ्रम के कारण है कि हम इसे संतोषजनक मानते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)