माया में दो शक्तियां होती हैं - पहली जीव को ढकती है, और दूसरी उसे जीवन की नारकीय स्थिति में फेंक देती है। जब कोई माया से ढका होता है, तो वह विवेक की सारी शक्ति खो देता है, और माया ऐसे मूर्ख को अज्ञान के अंधकार में फेंक देती है। जब कोई स्वयं को गलत तरीके से भगवान कृष्ण, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व से स्वतंत्र मानता है, तो वह भौतिक भोग-विलास का आनंद लेने की आशा में अस्थायी भौतिक वस्तुओं का उपासक बन जाता है, और जैसे-जैसे वह बूढ़ा होता जाता है, उसका जीवन भय और चिंता से भर जाता है। एक सशर्त आत्मा स्वयं को अपने जीवन का नियंत्रण करने वाला मानती है, लेकिन चूंकि उसके पास कोई वास्तविक नियंत्रक शक्ति नहीं है, इसलिए उसकी स्थिति विरोधाभासी है और बिल्कुल भी सुखद नहीं है। जैसे ही उसके सभी भौतिक संपत्ति समय के साथ चली जाती है, वह विलाप से भर जाता है। कुल मिलाकर, भौतिक जीवन वास्तव में घृणित है, और यह केवल घने भ्रम के कारण है कि हम इसे संतोषजनक मानते हैं।
